ज्यादा जोगी मठ उजाड़, वाली कहावत चरितार्थ हो गई प्रेमानंद महाराज के साथ
मिर्जापुर (अमरेश चंद्र पाण्डेय/अभय त्रिपाठी) । संत गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि "माया महा ठगिनि हम जानी"। उनके अनुसार, मनुष्यों को ठगने वाली माया से बढ़कर संसार में कोई नहीं है। ईश्वर भी कहते हैं, मनुष्यों को ठगने के लिए मेरी महामाया दो ही रूप में पृथ्वी पर विचरण कर रही है - एक नारी के रूप में, दूसरे धन-संपदा के रूप में। जिसने पराई नारी को माता व पराई धन-संपदा को धूल के समान मान लिया, वही ईश्वर की माया से बच पाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रेमानंद महाराज उच्च कोटि के संत हैं और ईश्वर स्वरूप हैं। किन्तु उतना ही सत्य यह भी है कि एक सच्चे संत को भी माया कितना नीचे गिरा देती है, इसके जीते-जागते उदाहरण हैं प्रेमानंद महाराज।
प्रेमानंद महाराज द्वारा की गई भूल पर प्रकाश डालना अनिवार्य होगा। जो भी संदिग्ध चरित्र के व्यक्ति इधर-उधर से भाग कर आते गए, प्रेमानंद जी ने उन्हें दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाते गए। उनमें साध्वियां भी थीं। भले प्रेमानंद जी अपने हाथ से पैसा न छूते रहे हों, किन्तु उनके शिष्य दोनों हाथ से पैसा बटोर रहे हैं, यह प्रेमानंद जी को पता नहीं था। वैभव-विलासिता से परिपूर्ण कई जगह इतने बड़े आश्रम बिना प्रेमानंद जी की जानकारी में खड़े हो गए।
आश्रमों पर रहने वाले दीक्षित शिष्यों व साध्वियों की जानकारी पुलिस को प्रेमानंद जी ने क्यों नहीं दी? समय रहते पुलिस वहां रहने वाले सबकी जन्म कुंडली खंगाल लेती तो रसिक दुलारी जैसी घटना आज न होती। दरअसल प्रेमानंद जी के शिष्य आपस में गुटों में बंट गए हैं और वे यह जानते हैं कि प्रेमानंद जी कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। शिष्यों, जिसमें साध्वियां भी शामिल हैं, के बीच पूरे दिन-रात इसी बात पर मंथन हो रहा है कि महाराज जी का उत्तराधिकारी कौन बनेगा? आश्रम में निवास करने वालों के चाल-चरित्र, चेहरों की जांच होनी चाहिए। मामले को सीबीआई को सौंप देना चाहिए, इससे पारदर्शिता बनी रहेगी और सच्चाई सामने आ जाएगी। यदि आप भी वैरागी संत हैं तो शिष्य पालने से परहेज करिए। वरना सभी शिष्य मिलकर एक दिन मठ को उजाड़ कर रख देंगे।