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COVID-19 टीकाकरण के बाद हुई मृत्यु पर मुआवजा देने के सुप्रीम कोर्ट का आदेश

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एडवोकेटआकाश दीक्षित लखनऊ उच्च न्यायालय

लखनऊ । लखनऊ उच्च न्यायालय के एडवोकेटआकाश दीक्षित ने बताया है कि
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत में विश्व के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में से एक चलाया गया, जिसके माध्यम से करोड़ों लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए टीके लगाए गए । सामान्यतः कोविड-19 टीके सुरक्षित और प्रभावी पाए गए, किंतु कुछ दुर्लभ मामलों में टीकाकरण के बाद गंभीर प्रतिकूल प्रभाव की शिकायतें भी सामने आईं । ऐसे ही मामलों को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है । यह मामला रचना गंगा व एक अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य, रिट याचिका (सिविल) संख्या 1220/2021 से संबंधित है, जिसमें कुछ अभिभावकों ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटियों की मृत्यु कोविड-19 टीकाकरण के बाद हुए गंभीर प्रतिकूल प्रभाव के कारण हुई । याचिका कर्ताओं ने अदालत से यह मांग की थी कि ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच कराई जाए तथा पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए । इस मामले की सुनवाई के दौरान मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह कोविड-19 टीकाकरण के बाद होने वाली गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के मामलों में पीड़ितों के लिए “नो-फॉल्ट कम्पेन्सेशन पॉलिसी” तैयार करे । अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को कोविड-19 वैक्सीन लेने के बाद गंभीर प्रतिकूल प्रभाव होता है और चिकित्सकीय जांच से यह स्थापित हो जाता है कि उसका संबंध टीकाकरण से है, तो ऐसे मामलों में पीड़ित या उनके परिवार को मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए । “नो-फॉल्ट कम्पेन्सेशन” का अर्थ यह है कि पीड़ित को मुआवजा प्राप्त करने के लिए सरकार, चिकित्सक या वैक्सीन निर्माता की लापरवाही सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होगी । अदालत ने यह भी कहा कि भारत ने महामारी के समय व्यापक टीकाकरण अभियान चलाया जिससे करोड़ों लोगों की जान बची, किंतु यदि दुर्लभ परिस्थितियों में किसी नागरिक को टीकाकरण के कारण गंभीर नुकसान होता है तो एक कल्याणकारी राज्य के रूप में सरकार का दायित्व बनता है कि वह ऐसे पीड़ितों को सहायता प्रदान करे । सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार बनने वाली नीति का लाभ उन व्यक्तियों को मिल सकेगा जिन्हें कोविड-19 वैक्सीन के बाद गंभीर चिकित्सकीय प्रतिकूल प्रभाव हुआ हो और जिसकी पुष्टि विशेषज्ञ चिकित्सकीय जांच समिति द्वारा की गई हो । इसके अतिरिक्त ऐसे मामलों में यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसके आश्रित परिवारी जन भी इस मुआवजा व्यवस्था के अंतर्गत लाभ प्राप्त कर सकेंगे । साथ ही जिन व्यक्तियों को टीकाकरण के बाद स्थायी विकलांगता या गंभीर स्वास्थ्य क्षति हुई है और जिनका जीवन तथा आजीविका प्रभावित हुई है, उन्हें भी इस नीति के अंतर्गत राहत मिल सकती है, बशर्ते चिकित्सकीय विशेषज्ञों की जांच से यह स्थापित हो कि घटना का वैक्सीन से प्रत्यक्ष संबंध है । सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की मुआवजा व्यवस्था का उद्देश्य टीकों की सुरक्षा पर प्रश्न चिह्न लगाना नहीं है, बल्कि उन दुर्लभ मामलों में पीड़ितों को राहत प्रदान करना है जहाँ टीकाकरण के बाद गंभीर नुकसान हुआ हो । इस प्रकार यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ-साथ नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में किसी भी बड़े टीकाकरण अभियान के दौरान पीड़ितों के लिए एक मानवीय और उत्तरदायी व्यवस्था सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त करता है ।