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सरस हॉस्पिटल में महिला की मौत: सीएमओ ने बैठाई जांच, सच सामने आएगा या फाइलो में दफन हो जाएगा मामला?

महिला की मौत पर जांच का मरहम, या ‘मैनेजमेंट’ का खेल?

पहले मौत, फिर हंगामा और अब जांच! सरस हॉस्पिटल प्रकरण में उठे सवाल कहीं फाइलों में न दफन हो जाए सच

महिला की मौत पर सीएमओ ने गठित की जांच टीम, अब सवाल जांच होगी या फाइलों में दफन हो जायेगा मामला?

सरस हॉस्पिटल प्रकरण में जांच के आदेश के बाद भी उठ रहे सवाल; परिजनों के आरोप गंभीर, मेडिकल कॉलेज से हायर सेंटर की सलाह के बाद निजी अस्पताल में भर्ती कराने के पूरे घटनाक्रम की होगी पड़ताल
KUSHINAGAR NEWS: जनपद के पडरौना स्थित सरस हॉस्पिटल में इलाज के दौरान 30 वर्षीय महिला की मौत के मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने जांच टीम गठित कर जांच का आदेश तो दे दिया है, लेकिन इसके साथ ही बड़ा सवाल यह भी है कि क्या इस बार जांच सच तक पहुंचेगी या फिर मामला जांच की फाइलों में ही दफन होकर रह जायेगा? महिला की मौत के बाद सड़क पर उतरे परिजनों के आरोपों ने निजी अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था और उनकी निगरानी पर सवाल खड़े कर दिये हैं। ऐसे में सीएमओ की ओर से जांच टीम गठित किया जाना कार्रवाई की दिशा में पहला कदम जरूर है, लेकिन असली परीक्षा जांच की निष्पक्षता और उसके नतीजे की होगी।
हायर सेंटर की सलाह के बाद निजी अस्पताल में भर्ती, फिर मौत
बिहार के धनहा निवासी अंगिरा चौहान की सड़क हादसे में सिर में गंभीर चोट लगी थी। हालत गंभीर होने पर उन्हें  पहले स्थानीय निजी अस्पताल और फिर कुशीनगर मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया। परिजनों के अनुसार मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने महिला को हायर सेंटर ले जाने की सलाह दी थी। आरोप है कि इसी दौरान सरस हॉस्पिटल के कथित एजेंटों ने बेहतर इलाज का भरोसा दिलाया और महिला को दोबारा निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। कुछ समय बाद उसकी मौत हो गयी।महिला की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया और शव सड़क पर रखकर पडरौना-जिला मुख्यालय मार्ग जाम कर दिया। परिजनों ने पूरे मामले की जांच के साथ अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
सीएमओ ने जांच टीम गठित कर दिया आदेश
मामला सड़क से उठकर स्वास्थ्य विभाग तक पहुंचा तो मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने जांच टीम गठित कर दी। टीम को पूरे प्रकरण की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। अब जांच में यह देखा जाना महत्वपूर्ण होगा कि महिला को किस स्थिति में अस्पताल में भर्ती किया गया, उसका उपचार सरस हास्पिटल के किस चिकित्सक ने किया, सरस हास्पिटल में उस समय कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध थीं और गंभीर हालत के बावजूद उपचार की प्रक्रिया क्या रही।साथ ही मेडिकल कॉलेज से हायर सेंटर रेफर किये जाने की सलाह के बाद महिला को दोबारा निजी अस्पताल लाने के पूरे घटनाक्रम की भी जांच जरूरी है।
सिर्फ जांच टीम बना देने से खत्म नहीं होंगे सवाल
स्वास्थ्य विभाग की जांच शुरू होने के साथ ही मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच कितनी निष्पक्ष होगी। आम तौर पर किसी निजी अस्पताल में इलाज के दौरान गंभीर घटना के बाद जांच बैठती है, रिपोर्ट तैयार होती है और कुछ समय बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। इस प्रकरण में ऐसा न हो, यही परिवार और क्षेत्र के लोगों की सबसे बड़ी चिंता है। कहीं ऐसा न हो कि जांच के नाम पर मामला फाइलों में दफन हो जाये और कुछ दिनों बाद सब कुछ पहले की तरह चलता रहे।
‘मैनेज’ के खेल की चर्चा ने बढ़ायी बेचैनी
मामले में जांच का आदेश होने के बावजूद क्षेत्र में ‘मैनेज’ के खेल की चर्चा भी जोर पकड़ रही है। लेकिन जिस तरह निजी अस्पताल में महिला की मौत के बाद परिजन सड़क पर उतर आये और अब जांच बैठायी गयी है, उससे जांच की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। जांच टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अस्पताल प्रबंधन, इलाज करने वाले चिकित्सकों, मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड और परिजनों के आरोपों को एक साथ सामने रखकर तथ्यात्मक निष्कर्ष तक पहुंचे। यदि इलाज में कोई गंभीर कमी मिलती है तो केवल कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।
जांच में इन सवालों का जवाब जरूरी
जानकारों का कहना है कि महिला की गंभीर हालत के बावजूद उसे हायर सेंटर क्यों नहीं ले जाया गया?सरस हॉस्पिटल के कथित एजेंट मेडिकल कॉलेज परिसर में किस हैसियत से मौजूद थे?महिला को दोबारा निजी अस्पताल में किसके कहने पर भर्ती कराया गया?भर्ती के समय महिला की मेडिकल स्थिति क्या थी?इलाज किस चिकित्सक ने किया और अस्पताल में कौन-कौन सी आपात सुविधाएं उपलब्ध थीं? परिजनों से इलाज के नाम पर कितनी रकम ली गयी? मेडिकल कॉलेज की सलाह और निजी अस्पताल के उपचार के बीच क्या कोई महत्वपूर्ण कड़ी छूटी? महिला की मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था? इन सवालों के जवाब जांच रिपोर्ट में सामने आना जरूरी है। केवल यह लिख देना कि इलाज के दौरान महिला की मौत हुई, मामले की तह तक पहुंचना नहीं होगा।
परिजनों की नजर अब जांच रिपोर्ट पर
महिला की मौत से परिवार पहले ही टूट चुका है। दो मासूम बच्चियों की मां की मौत के बाद परिजन अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि यह जानना चाहते हैं कि उनकी महिला की जान कैसे गयी। सड़क पर उतरकर विरोध करने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग ने जांच का भरोसा दिया है। ऐसे में जांच रिपोर्ट ही तय करेगी कि परिवार को न्याय की उम्मीद मिलती है या यह मामला भी उन मामलों की कतार में शामिल हो जायेगी, जिनमें जांच शुरू तो हुई, लेकिन नतीजा कभी सामने नहीं आया।
जांच पहुंचती है अस्पताल तक या फाइल तक
सीएमओ द्वारा जांच टीम गठित करना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन असली सवाल जांच शुरू होने का नहीं, जांच के अंजाम तक पहुंचने का है। अगर जांच निष्पक्ष हुई तो इलाज की पूरी प्रक्रिया, मेडिकल रिकॉर्ड और जिम्मेदारी तय हो सकती है। लेकिन अगर जांच महज औपचारिकता बनकर रह गयी तो सड़क पर शव रखकर न्याय मांगने वाले परिवार के सवाल फिर अनुत्तरित रह जायेंगे। ऐसे मे
अब स्वास्थ्य विभाग की अग्निपरीक्षा है कि क्या जांच सच सामने लायेगी या फिर एक बार फिर ‘जांच जारी है’ के भरोसे पूरा प्रकरण फाइलों में दफन हो जायेगा?