PRATAPGARH NEWS: केंद्र सरकार द्वारा SC/ST उत्पीड़न मामलों में मुआवजा राशि बढ़ाने के प्रस्ताव पर बृजेश तिवारी, सेवदार, प्रतापगढ़ ने सामाजिक न्याय में “दोहरे मापदंड” पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि किसी जाति या समुदाय के अधिकारों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन न्याय जाति देखकर नहीं, अपराध देखकर होना चाहिए। सरकार के प्रस्ताव के अनुसार SC/ST उत्पीड़न के मामलों में मौजूदा ₹85,000 से ₹8.25 लाख तक की राहत राशि को बढ़ाकर लगभग 43% तक किया जाएगा। नई व्यवस्था में न्यूनतम ₹1 लाख और अधिकतम ₹12 लाख तक मुआवजा देने का प्रस्ताव है। साथ ही विशेष SC/ST थानों के लिए ₹5 लाख और विशेष अदालतों के लिए ₹90.70 लाख तक की आर्थिक सहायता का प्रावधान भी बताया गया है। बृजेश तिवारी ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता और न्याय का अधिकार देता है। SC/ST के साथ जातिगत अत्याचार होता है तो दोषी को कड़ी सजा और पीड़ित को त्वरित न्याय मिलना चाहिए। लेकिन यदि सामान्य वर्ग के गरीब, किसान, मजदूर या महिला के साथ गंभीर अपराध होता है तो उसकी पीड़ा भी उतनी ही वास्तविक है। उन्होंने सरकार से 5 सीधे सवाल किए:क्या सामान्य वर्ग के पीड़ित को भी गंभीर अपराध में समान आर्थिक सुरक्षा मिलेगी? क्या झूठे मुकदमे में फंसाए गए निर्दोष व्यक्ति के लिए मुआवजे और कानूनी संरक्षण की व्यवस्था होगी? क्या सभी जातियों के गरीब नागरिकों के लिए समान कानूनी सहायता उपलब्ध होगी? क्या विशेष अदालतों के साथ सामान्य नागरिकों के लंबित मुकदमों के निस्तारण की गति भी बढ़ेगी? क्या सामाजिक न्याय का लक्ष्य जातियों को अलग करना है या सबको समान मंच पर लाना है? बृजेश तिवारी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा SC/ST Act के कथित दुरुपयोग पर की गई टिप्पणी और मुआवजा लौटाने के आदेश का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इसका अर्थ कानून गलत होना नहीं, बल्कि हर कानून में निष्पक्ष जांच जरूरी है।
“न्याय की कोई जाति नहीं”
बृजेश तिवारी ने कहा, “मेरी मांग किसी वर्ग से अधिकार छीनने की नहीं है। मेरी मांग है कि जिसे संवैधानिक अधिकार मिल रहा है उसे मिले, लेकिन किसी दूसरे के अधिकार की कीमत पर नहीं। “उन्होंने मांग की कि सरकार ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें अत्याचार करने वाले को जाति देखकर नहीं अपराध देखकर सजा मिले और पीड़ित को जाति देखकर नहीं, उसकी पीड़ा देखकर न्याय मिले। अंत में उन्होंने कहा: “न्याय की कोई जाति नहीं होती, न्याय का कोई धर्म नहीं होता, न्याय केवल न्याय होता है। समान अधिकार, समान सम्मान और समान न्याय ही सच्चा सामाजिक न्याय है।”







