नीलगायों की घटती मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता, अब गांवों में कम दिखते झुंड
छुट्टा मवेशियों के बीच खो गई नीलगायों की पहचान
जनपद में घटा दिखाव, पहले जैसे नहीं रहे झुंड
FATEHPUR NEWS: (शीबू खान) गंगा–यमुना दोआब के बीच बसे फतेहपुर जनपद में नीलगायों की संख्या और उनकी दृश्यता में कमी देखी जा रही है। ग्रामीण इलाकों में जहां पहले नीलगायों के झुंड आसानी से दिखाई देते थे, वहीं अब इनका दिखना काफी कम हो गया है, जिससे स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ी है। ग्रामीणों के अनुसार करीब एक दशक पहले तक खेतों में 15 से 20 नीलगायों के झुंड आम बात थे। फसलों को नुकसान पहुंचाने के कारण किसान रात में खेतों की रखवाली भी करते थे। लेकिन वर्तमान समय में कई गांवों में महीनों तक एक भी नीलगाय नजर नहीं आती। किसानों का कहना है कि अब खेतों में नीलगायों की जगह छुट्टा मवेशी अधिक दिखाई देते हैं, जो फसलों को ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नीलगायों के कम दिखने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें खेती के तौर-तरीकों में बदलाव, खेतों की घेराबंदी (फेंसिंग), आबादी में वृद्धि और प्राकृतिक आवास में कमी प्रमुख हैं। पहले जहां खुले मैदान और चराई के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध था, वहीं अब कृषि भूमि और बस्तियों के विस्तार के कारण नीलगायों के रहने के स्थान सीमित हो गए हैं। इस संबंध में पशुधन विभाग उत्तर प्रदेश के अधिकारियों का कहना है कि नीलगाय पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं, लेकिन उनकी गतिविधियों और स्थान में बदलाव आया है। चूंकि नीलगाय वन्यजीव की श्रेणी में आती है, इसलिए उनकी निगरानी का कार्य मुख्य रूप से वन विभाग द्वारा किया जाता है। नीलगायों का कम दिखना केवल एक वन्यजीव की कहानी नहीं है। यह उस बदलते संतुलन की कहानी है जिसमें इंसान आगे बढ़ रहा है, प्रकृति पीछे हट रही है और दोनों के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। वहीं अधिकारियों के अनुसार वे अब ऐसे क्षेत्रों की ओर चली गई हैं जहां मानव हस्तक्षेप कम है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले नीलगाय फसलों के लिए बड़ी समस्या थीं, लेकिन अब छुट्टा मवेशियों की संख्या बढ़ने से स्थिति बदल गई है। किसानों के अनुसार अब सबसे ज्यादा नुकसान अन्ना पशुओं से हो रहा है, जिससे नीलगायों पर ध्यान कम हो गया है। वहीं कुछ ग्रामीणों का मानना है कि पर्यावरणीय असंतुलन के कारण भी नीलगायों की संख्या में कमी आई है। उनका कहना है कि यदि समय रहते वन्यजीवों के संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में इनकी संख्या और कम हो सकती है। फिलहाल नीलगायों की घटती मौजूदगी को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनकी कम होती संख्या और बदलती स्थिति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। युवा पीढ़ी के लिए नीलगाय अब उतनी परिचित नहीं रही। उनके लिए यह एक “कभी-कभार दिखने वाला जानवर” बन चुकी है। ऐसे में भविष्य के लिहाज से सवाल उठना लाजमी है कि क्या आने वाली पीढ़ी नीलगायों को सिर्फ किताबों में देखेगी? या हम समय रहते इस बदलते संतुलन को समझ पाएंगे? वैसे नीलगाय अभी पूरी तरह लुप्त नहीं हुई हैं, लेकिन उनकी “मौजूदगी” अब एक याद बनती जा रही है। एक पहलू से अब किसानों के लिए बड़ी समस्या बने हैं छुट्टा मवेशी इससे नीलगाय चर्चा से बाहर सी हो गई है।







