MIRZAPUR NEWS: (शाहिद वारसी) 21 रमज़ान 40 हिजरी, बुधवार की देर रात वासलीगंज स्थित मरहूम एस. तनवीर रज़ा के अजाखाने से मौला अली अलैहिस्सलाम की यौमे शहादत के मौके पर ताबूत व अलम का जुलूस निकाला गया। जुलूस में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में अज़ादारों की भीड़ उमड़ पड़ी। अज़ादार ताबूत को कंधा देकर “या अली, या अली” के नारे लगाते हुए चल रहे थे।
जुलूस से पहले नफीसुल रिज़वी ने मौला अली अलैहिस्सलाम की शान में मजलिस पढ़ी और मसायब बयान किए। उन्होंने कहा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) इस्लाम के पहले इमाम और पैगंबर हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.) के दामाद थे। अमीरुल मोमनीन हज़रत मौला अली अ.स. ने इस्लाम की हिफ़ाज़त और सरबुलंदी के लिए पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद ﷺ के साथ लगभग हर बड़ी जंग में हिस्सा लिया। बद्र, उहुद, खंदक, ख़ैबर और हुनैन जैसी अहम जंगों में मौला अली अ.स. की बहादुरी के किस्से आज भी तारीख़ में दर्ज हैं। बाद में अपने ख़िलाफ़त के दौर में भी उन्होंने जमल, सिफ़्फ़ीन और नहरवान जैसी बड़ी जंगों का सामना किया। उन्होंने बताया कि 19 रमज़ान की सुबह मौला अली (अ.स.) नमाज़-ए-फ़ज्र अदा करने के लिए मस्जिद-ए-कूफ़ा पहुंचे। जब आप सजदे में गए तो पहले से घात लगाए बैठा बदनसीब इब्न-ए-मुलजिम ने ज़हर में बुझी तलवार से वार कर गंभीर रूप से घायल कर दिया। वार लगते ही मौला अली की ज़ुबान से यह जुमला निकला, “रब्बे काबा की कसम, मैं कामयाब हो गया। उन्होंने कहा कि जब यह खबर मौला अली के घर पहुंची तो घर में क़यामत जैसा मंजर था। मौला के बेटे इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ.स.) दौड़ते हुए मस्जिद पहुंचे। दोनों बेटों की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे। घर में मौजूद बेटियां अपने पिता को इस हालत में देखकर फूट-फूट कर रोने लगीं। बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा बार-बार अपने बाबा से पूछ रही थीं, “बाबा! यह जुल्म किसने किया?” नफीसुल रिज़वी ने बताया कि 20 रमज़ान तक ज़हर का असर बढ़ता गया और मौला अली (अ.स.) की हालत नाज़ुक होती चली गई। कभी होश आता, कभी बेहोशी छा जाती। घर के अंदर हर तरफ सिसकियों की आवाज़ गूंज रही थी। कोई मौला के हाथ को पकड़ कर रो रहा था, तो कोई उनके कदमों से लिपटकर रो रहा था। उन्होंने कहा कि 20 रमज़ान तक ज़हर का असर बढ़ता गया और मौला अली (अ.स.) की हालत नाज़ुक होती चली गई। तीन दिन तक ज़ख्मों की तकलीफ सहने के बाद 21 रमज़ान को आपकी शहादत हो गई। यह सुनकर कूफ़ा की गलियों में सन्नाटा छा गया और हर आंख नम हो गई। इसके बाद जुलूस को रवाना किया गया। जुलूस का संचालन मरहूम एस. तनवीर रज़ा के पुत्र रोहन रज़ा व फरहान रज़ा की अगुवाई में किया गया, जो हर वर्ष इसकी व्यवस्था संभालते हैं। जुलूस के दौरान ताबूत को देखकर अज़ादारों की आंखें नम हो गईं। जुलूस फतेह खां का बाड़ा स्थित बड़ी ताजिया के पास लगभग 20 मिनट तक रुका रहा, जहां महिलाओं सहित लोगों ने मन्नतें मांगीं। इस दौरान जंजीर का मातम भी किया गया। जुलूस अपने पुराने रास्तों से होते हुए बाटा चौराहा, घंटाघर, बसनही बाजार, त्रिमुहानी, टेढ़ी नीम और बल्ली का अड्डा होते हुए इमामबाड़ा स्थित कर्बला पहुंचकर समाप्त हुआ। कर्बला पहुंचने पर अंजुमन अंसार-ए-हुसैन के सदस्यों ने नौहा पढ़ा। जुलूस रात 8:30 बजे अजाखाने से उठा और लगभग 11:30 बजे इमामबाड़ा स्थित कर्बला पहुंचकर संपन्न हुआ। जुलूस को शांतिपूर्ण संपन्न कराने में पुलिस प्रशासन का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस अवसर पर रोहन रज़ा, फरहान रज़ा, अरमान अली, दानिश रिज़वी, मौलाना अबरार हुसैन वारसी,इरशाद अंसारी, रिजवान अंसारी, शाहिद, शमशेर मुजम्मिल हुसैन, नफ़ीसुल रिज़वी, मुज्तबा हुसैन रिजवी समेत बड़ी संख्या में अज़ादार मौजूद रहे।







