JHANSI NEWS: जनपद में विकास कार्यों की हकीकत अब सवालों के कटघरे में खड़ी है। टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठ रहे आरोप थमने का नाम नहीं ले रहे। चर्चा है कि टेंडर निकलने से पहले ही “मैदान” तय हो जाता है और फाइलों की रफ्तार “कृपा” के अनुसार बढ़ती-घटती है। काम मिलते ही कुछ ठेकेदार नियमों को ठेंगा दिखाते हैं—और जिम्मेदार अफसर मौन साध लेते हैं।
टेंडर से पहले ‘सेटिंग’, बाद में मनमानी?
सूत्रों का दावा है कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान कुछ ठेकेदार अधिकारियों के चक्कर काटते हैं। आरोप यह भी हैं कि कथित लेन-देन के बाद काम “पक्का” हो जाता है। नतीजा—कार्य आवंटन होते ही गुणवत्ता, मानक और समय-सीमा सब कागज़ों में सिमटकर रह जाते हैं।
जनता पूछ रही है—यदि सब कुछ पारदर्शी है तो फिर एक ही चेहरे बार-बार कैसे चमकते हैं? प्रतिस्पर्धा का दावा कहाँ है और ई-टेंडरिंग की साख किसके भरोसे?
ज़मीनी हकीकत: उखड़ती सड़कें, अधूरी नालियाँ
शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक कई परियोजनाओं पर सवाल हैं। कहीं नई सड़क कुछ महीनों में उखड़ रही है, कहीं नाली आधी बनी है, तो कहीं निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर उंगलियाँ उठ रही हैं। तय समय-सीमा का पालन न होना आम बात बनती जा रही है।
शिकायतें दर्ज होती हैं, निरीक्षण की बातें होती हैं, पर कार्रवाई का असर कम ही दिखता है। यही चुप्पी अब संदेह को और गहरा कर रही है।
“चुप रहिए… वरना अंजाम भुगतिए”—क्या सच?
सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि एक ठेकेदार ने कथित तौर पर एक अधिकारी को शांत रहने की सलाह दी और अन्यथा परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक गरिमा को चुनौती है।
सवाल यह है—क्या विभागीय चुप्पी दबाव की देन है या पहले की मेहरबानियों का बोझ? अगर अफसर बोलें तो कहीं “कलई” न खुल जाए—क्या यही डर व्यवस्था को जकड़े हुए है?
करोड़ों का खेल, हिसाब कौन देगा?
विकास कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। जनता के टैक्स का पैसा दांव पर है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि:
किन-किन कार्यों के टेंडर किसे और किन शर्तों पर दिए गए?
तकनीकी व वित्तीय मूल्यांकन की प्रक्रिया क्या रही?
गुणवत्ता नियंत्रण की निगरानी किस स्तर पर और कितनी बार हुई?
यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है, तो सूची और रिपोर्ट सार्वजनिक करने में हिचक क्यों?
जनता की मांग—जांच, जवाबदेही और कार्रवाई
सभी आवंटित कार्यों की सार्वजनिक सूची जारी हो।
स्वतंत्र एजेंसी से गुणवत्ता ऑडिट कराया जाए।
दोषी ठेकेदारों की ब्लैकलिस्टिंग हो।
लापरवाह या संलिप्त अधिकारियों पर विभागीय व कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। विकास के नाम पर यदि कमीशन राज पनप रहा है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं—जनविश्वास पर चोट है। अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। या तो जांच की रोशनी में सच सामने आएगा, या फिर चुप्पी का अंधेरा सवालों को और तीखा करता जाएग।







