KAUSHAMBI NEWS: जिले में कहते हैं। दीया तले अंधेरा होता हैं। और सिराथू ब्लॉक का भरवारी सगुनी गांव आज इस कहावत का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। यहां की फिजाओं में अब महुआ पेड़ छाया नहीं और खुशबू नहीं, बल्कि अवैध रूप से कटते हरे-भरे पेड़ों की कराह सुनाई दे रही है। एक ओर सरकार वृक्षों को पुत्र समान बचाने की बातें करती है, तो दूसरी ओर सिराथू क्षेत्र में लकड़ी माफिया जैकेश बेखौफ होकर फलदार पेड़ों का सफाया कर रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि सगुनी गांव में लकड़ी माफिया जैकेश द्वारा महुआ के बड़े-बड़े पेड़ों की अवैध कटाई दिनदहाड़े की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि घटनास्थल से चौकी भरवारी कदमों की दूरी पर पुलिस चौकी स्थित है, बावजूद इसके न तो पुलिस की सक्रियता दिखाई देती है और न ही माफिया को कानून का कोई भय।आरोप है लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की नजर तक नहीं पड़ी। अब सवाल यह उठता है कि यह महज लापरवाही है या फिर पुलिस और माफिया के बीच किसी प्रकार की सांठगांठ का नतीजा।वन विभाग की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। विभागीय स्तर पर मुकदमा दर्ज करने की बात तो कही जा रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे इतर है। ग्रामीणों का कहना हैं कि माफिया पेड़ काटने की अनुमति को ढाल बनाकर महुआ के विशाल पेड़ों का सफाया कर रहा है। जिन पेड़ों ने वर्षों तक राहगीरों को छाया और फल दिए, वे आज ठूंठ में तब्दील कर दिए गए हैं।ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि आखिर माफिया का मनोबल इतना ऊंचा किसके संरक्षण से है? क्या खाकी की खामोशी के पीछे कोई बड़ा लेन-देन है, या फिर प्रशासनिक मौन ने माफिया को खुली छूट दे दी हैं।अब क्षेत्रवासियों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो सगुनी गांव का पर्यावरण पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। यह मांग अब केवल शिकायत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली बचाने की आखिरी पुकार बन चुकी हैं।







