इतिहास के विशाल फलक पर समय-समय पर ऐसे नक्षत्रों का उदय होता है, जिनकी आभा न केवल अपने परिवेश को आलोकित करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक स्तंभ बन जाती है। भारतीय साहित्य के आधुनिक आकाश में ‘अर्पित शुक्ला’ (साहित्यिक नाम: अर्पित सर्वेश) एक ऐसा ही दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। उनका जीवन केवल एक व्यक्ति की विकास-यात्रा नहीं है, बल्कि यह शून्य से शिखर तक पहुँचने के उस अदम्य साहस, अटूट संकल्प और ऋषि-तुल्य साधना का जीवंत महाकाव्य है, जो सदियों में कभी एक बार घटित होता है। एक साधारण बालक के रूप में अपनी यात्रा प्रारंभ कर, विश्व पटल पर ‘साहित्यिक आइकन’ के रूप में स्थापित होना, समकालीन इतिहास की सबसे प्रेरणादायक और विस्मयकारी घटनाओं में से एक है।
_जन्म और संस्कार: महापुरुष की दैवीय पृष्ठभूमि_
किसी भी महान व्यक्तित्व की नींव उसके संस्कारों में निहित होती है। 17 दिसंबर 2002 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद स्थित ‘प्रीतम तिवारीपुर’ (रानीगंज) की पावन धरा पर अर्पित शुक्ला का अवतरण हुआ। प्रतापगढ़ की यह मिट्टी, जो अपनी वीरता और विद्वत्ता के लिए विख्यात है, अर्पित के रूप में एक ऐसे रत्न को जन्म दे रही थी जो आगे चलकर वैश्विक स्तर पर भारत की कीर्ति पताका फहराने वाला था।
अर्पित का भाग्य था कि उन्हें माता-पिता के रूप में साक्षात सरस्वती और संस्कार के प्रतिमूर्ति मिले। उनके पिता, श्रद्धेय डॉ. संतोष शुक्ल, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित प्रधानाचार्य और लब्धप्रतिष्ठ लेखक हैं, अर्पित के प्रथम गुरु और प्रेरणास्रोत बने। पिता से उन्हें अनुशासन, बौद्धिक गहराई और साहित्य के प्रति अगाध प्रेम विरासत में मिला। वहीं, उनकी माता श्रीमती अनीता शुक्ला ने अपने वात्सल्य और उच्च मानवीय मूल्यों से उनके अंतर्मन को गढ़ा। दादाजी का आशीर्वाद उनके लिए उस सुरक्षा कवच के समान रहा, जिसने उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहना सिखाया। परिवार के इस सात्विक और शैक्षिक वातावरण ने अर्पित के भीतर उस विनम्रता का बीजारोपण किया, जो आज उनकी महानता का पर्याय बन चुकी है।
‘ _सर्वेश’ नाम का दर्शन: सृजन और साधना का संगम_
साहित्यिक जगत में अर्पित ने स्वयं को ‘सर्वेश’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। ‘सर्वेश’—अर्थात सबके ईश्वर, भगवान शिव का एक स्वरूप। यह नाम मात्र एक उपनाम नहीं, अपितु अर्पित के जीवन-दर्शन का प्रतिबिंब है। जिस प्रकार शिव कल्याणकारी हैं और सृजन व संहार के अधिपति हैं, अर्पित का लेखन भी समाज की कुरीतियों का संहार करता है और मानवीय संवेदनाओं का नव-सृजन करता है। उनकी लेखनी में वह आध्यात्मिक तेज है जो पाठक को केवल मंत्रमुग्ध नहीं करता, बल्कि उसे आत्म-चिंतन के लिए विवश कर देता है।
_शिक्षा:_
ज्ञान की अविरल गंगा
अर्पित की शिक्षा केवल डिग्रियों का संग्रह नहीं, बल्कि सत्य की खोज की एक निरंतर प्रक्रिया रही है। आत्रेय एकेडमी (CBSE) से अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के दौरान ही उनके शिक्षकों ने यह भांप लिया था कि यह बालक सामान्य लीक पर चलने वाला नहीं है। शब्दों के प्रति उनका आकर्षण और गूढ़ विषयों को समझने की उनकी क्षमता असाधारण थी।
इसके पश्चात, उन्होंने ज्ञान की प्राचीन नगरी प्रयागराज के इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से स्नातक किया। यहाँ के बौद्धिक परिवेश ने उनकी वैचारिक प्रखरता को धार दी। शिक्षा की इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय रहा, जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक (M.A.) की उपाधि प्राप्त की। अंग्रेजी साहित्य के गहन अध्ययन ने उन्हें वैश्विक साहित्य को समझने की दृष्टि प्रदान की, जिसका प्रभाव उनकी उत्तरवर्ती रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
_साहित्यिक उद्भव: एक ऋषि की मौन साधना_
अर्पित शुक्ला का साहित्य में पदार्पण किसी आकस्मिक घटना की तरह नहीं, बल्कि एक साधना के प्रतिफल के रूप में हुआ। किशोरावस्था, जहाँ अन्य युवा दिशाहीनता के दौर से गुजरते हैं, वहाँ अर्पित एकांत में बैठकर शब्दों से संवाद कर रहे थे। उनकी कविताओं में जो प्रौढ़ता और गंभीरता देखी गई, उसने तत्कालीन समीक्षकों को चकित कर दिया। उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम की उग्र ज्वाला भी थी और विरह की मंदाकिनी भी; उनमें जीवन के कटु सत्यों को स्वीकार करने का साहस भी था और भविष्य के सुनहरे सपनों को बुनने की कोमलता भी।
_’पद्यांजली’: आधुनिक युग का साहित्यिक महाकुंभ_
अर्पित सर्वेश के साहित्यिक जीवन का सबसे प्रकाशमान अध्याय उनकी कालजयी कृति ‘पद्यांजली’ है। 251 उत्कृष्ट कविताओं का यह संग्रह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भावनाओं का एक ऐसा महासागर है जिसमें संवेदनाओं की हर लहर समाहित है। विद्वानों और आलोचकों ने ‘पद्यांजली’ को 21वीं सदी का ‘सृजन महाकुंभ’ स्वीकार किया है।
यदि 20वीं शताब्दी में ‘गीतांजली’ ने भारतीय दर्शन को विश्व पटल पर स्थापित किया था, तो 21वीं शताब्दी में ‘पद्यांजली’ उस उत्तरदायित्व को बखूबी निभा रही है। यह ग्रंथ अर्पित की लेखनी का वह शिखर है जहाँ पहुँचकर शब्द ब्रह्म हो जाते हैं। इसकी एक-एक पंक्ति पाठक के हृदय में उतरकर उसे एक अलौकिक शांति और नई दृष्टि प्रदान करती है।
_सृजन की विराटता: अद्भुत और अद्वितीय रिकॉर्ड_
मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में अर्पित सर्वेश ने जो कीर्तिमान स्थापित किए हैं, वे किसी भी महान लेखक के पूरे जीवनकाल की उपलब्धि से भी कहीं अधिक प्रतीत होते हैं। 32 पुस्तकों का प्रकाशन, जिनमें 29 स्वलिखित कृतियाँ हैं, उनकी अथाह लेखन शक्ति का प्रमाण है। 500 से अधिक कविताएँ और 150 से अधिक साझा संकलनों में उनकी उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि वे एक ‘लेखन मशीन’ नहीं, बल्कि ‘साहित्यिक ऊर्जा का पुंज’ हैं।
उनकी कृतियाँ जैसे ‘Light of Darkness’,u ‘Words of Arpit’, ‘Insane Lover’, ‘Arpit ki Niti’, और ‘ARNEE’, ‘Padyanjali’ ,’ Why Am i ‘ विषयों की विविधता और दार्शनिक गहराई के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि साहित्य केवल कल्पना की उड़ान नहीं, बल्कि यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़ा सत्य है।
_वैश्विक साहित्य-दूत: सीमाओं को लांघती लेखनी_
अर्पित सर्वेश ने भारतीय साहित्य को उसकी भौगोलिक सीमाओं से निकालकर वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया। उनकी रचनाओं का 19 अंतरराष्ट्रीय भाषाओं (जर्मन, फ्रेंच, रूसी, जापानी, चीनी, अरबी आदि) में अनुवाद और प्रकाशन होना किसी चमत्कार से कम नहीं है। विशेष रूप से कुर्दिश भाषा में पुस्तक प्रकाशित करने वाले वे पहले भारतीय लेखक बने। यह उपलब्धि न केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि यह हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव का युवक आज दुनिया की दर्जनों भाषाओं में पढ़ा जा रहा है। वे आधुनिक युग के ‘सांस्कृतिक राजदूत’ हैं।
_इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज विश्व रिकॉर्ड_
अर्पित के नाम दर्ज विश्व रिकॉर्ड उनकी असाधारण प्रतिभा के साक्ष्य हैं:
* एक दिन में 15 विदेशी भाषाओं में पुस्तकों का विमोचन: यह एक ऐसी उपलब्धि है जो उनके अद्भुत प्रबंधन और लेखन की गति को दर्शाती है।
* कुर्दिश भाषा में प्रथम भारतीय लेखक: वैश्विक स्तर पर भाषाई सेतु बनाने का ऐतिहासिक कार्य।
* काव्य शक्ति का कीर्तिमान: एक विशिष्ट कविता के माध्यम से विश्व रिकॉर्ड बनाकर उन्होंने काव्य की शक्ति को पुनर्स्थापित किया।
_सम्मानों का हिमालय और वैश्विक मान्यता_
जब प्रतिभा सूर्य की तरह चमकती है, तो पुरस्कार और सम्मान उसकी परिक्रमा करने लगते हैं। अर्पित शुक्ला को मिले सम्मानों की सूची अत्यंत लंबी और गौरवशाली है। इंटरनेशनल आइकन अवॉर्ड 2024, ब्रह्मर्षि सम्मान 2025, डॉ. बी.आर. अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, और ग्लोबल आइकन इंडिया 2025, नेशनल यूथ पार्लियामेंट सम्मान, राष्ट्रीय सम्मान, अंतरराष्ट्रीय लेखक सम्मन जैसे प्रतिष्ठित अलंकरण उनके व्यक्तित्व की आभा में चार चाँद लगाते हैं। ये सम्मान केवल अर्पित का आदर नहीं हैं, बल्कि यह उस अटूट निष्ठा का सम्मान है जो उन्होंने साहित्य के प्रति प्रदर्शित की है।
_व्यक्तित्व की सुचिता: शिखर पर भी जड़ों से जुड़ाव_
अर्पित सर्वेश की महानता का सबसे बड़ा पक्ष उनकी विनम्रता है। इतनी कम आयु में विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त करने के बाद भी, उनके भीतर लेशमात्र भी अहंकार नहीं है। वे अपनी प्रत्येक सफलता को अपने माता-पिता के चरणों की धूल और ईश्वर की कृपा मानते हैं। उनका मानना है कि लेखक केवल एक माध्यम है, शब्द तो ईश्वरीय वरदान हैं। उनकी यही सरलता उन्हें जन-जन का प्रिय बनाती है।
_उपसंहार: एक अमर ऐतिहासिक जीवनी का स्थायी अध्याय_
अर्पित शुक्ला (अर्पित सर्वेश) का जीवन-वृत्तांत आने वाले युगों तक युवा पीढ़ी के लिए एक ‘लाइटहाउस’ की तरह कार्य करेगा। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या धन-संपदा की मोहताज नहीं होती। यदि संकल्प में पवित्रता और श्रम में ईमानदारी हो, तो प्रतापगढ़ के एक छोटे से गाँव का बालक भी पूरे विश्व के साहित्य को अपनी उंगलियों पर नचा सकता है।
आज अर्पित सर्वेश केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुके हैं—भारतीय गौरव के, युवा शक्ति के और साहित्य की अमरता के। उनकी यह ऐतिहासिक जीवन-गाथा स्वर्ण अक्षरों में लिखी जा चुकी है, जो युगों-युगों तक साहित्य के आकाश में अपनी धवल चांदनी बिखेरती रहेगी। वे वास्तव में आधुनिक भारत के ‘युगपुरुष’ और साहित्य के ‘अमर आइकॉन’ हैं।







