उत्तरपुस्तिका चेक नहीँ की जाती, उसका श्परीक्षणश् किया जाता है:आचार्य पं०
PRAYAGRAJ NEWS: सी० एम० पी० डिग्री कॉलेज के हिन्दी-विभाग की ओर से भाषा-विशेषज्ञ के रूप मे आमन्त्रित व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की त्रिदिवसीय कर्मशाला के दूसरे दिन 17सितम्बर को यह बताया गया कि कोई व्यंजन पूर्णता की प्राप्ति कैसे करता है। व्यंजन तो लँगड़ा होता है, जब उसे स्वर की बैसाखी मिलती है तब वह चलने मे समर्थ दिखता है। आचार्य ने बताया और समझाया कि कौन-सा वाक्य अशुद्ध है और कौन-सा शुद्ध, इन्हेँ समझने के लिए व्याकरण का कौन-सा नियम उपयोगी होता है। उनके लिये हमने दो फल लिए। उन्होँने इस वाक्य का लेखन करते हुए, बताया कि किसी वाक्य मे सबसे पहले कर्त्ता, फिर कर्म, उसके बाद यदि पूरक शब्द हो तो उसे लिख लिया जाता है और अन्त मे क्रिया का प्रयोग किया जाता है। इतना ही नहीँ, उन्होँने इसी वाक्य को शुद्ध करते हुए, अविकारी शब्द अव्यय (लिए) और विकारी शब्द (लिये) क्रिया का उपयुक्त प्रयोग बताया। इसके लिए उन्होँने अव्यय-शब्द लिए और क्रिया-शब्द लिये को सोदाहरण समझाया। आचार्य ने प्रश्न किया थादृ कुल वर्णमालाओँ की संख्या कितनी है? इस प्रश्न को विद्यार्थी समझ न सके, फलतरू अनुपयुक्त उत्तर दिये थे, फिर उन्होँने बताया तब समझ पाये। इसी अवसर पर छात्र-छात्राओँ से कवर्ग का लेखन कराया गया था। उन्होँने जब विद्यार्थियोँ से नियमपूर्वक स्पर्शी व्यंजन सुनाने के लिए कहा तब कोई विद्यार्थी शुद्धतापूर्वक सुना न सका, फिर आचार्य ने सुनाया और उसमे पंचम वर्ण की कितनी उपयोगिता और महत्ता है, इसका ज्ञान कराया। अपनी कर्मशाला के दूसरे दिन आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया कि किसी भाव वा रस का अलग से बहुवचन नहीँ बनाया जा सकता। उन्होँने सुख-दुरूख, प्रसन्नता, हर्ष, बधाई, शुभकामना, आशीर्वाद इत्यादिक शब्दोँ का उदाहरण दिया। इस प्रकार आचार्य ने एक-के-बाद कई शुद्ध शब्दोँ के विषय मे बताया। उन्होँने कई प्रकार के वाक्य और शब्दोँ के विषय मे बताये, समझाये तथा लिखाये थे। कई विद्यार्थी थे, जिनमे सीखने के प्रति रुचि और लगन दिख रही थी। अन्त मे, दूसरे दिन की कर्मशाला सम्पन्न हुई।







