Home उत्तर प्रदेश प्रेमनगर में शुरू हुआ पारंपरिक एवं ऐतिहासिक मेला और विशाल दंगल

प्रेमनगर में शुरू हुआ पारंपरिक एवं ऐतिहासिक मेला और विशाल दंगल

हजारों की भीड़ उमड़ी, पहलवानों ने दिखाए दांवपेंच

FATEHPUR NEWS: थाना सुल्तानपुर घोष क्षेत्र के कस्बा प्रेमनगर में मंगलवार से पारंपरिक मेले की शुरुआत हो गई। सुबह से ही क्षेत्रीय ग्रामीणों और दूर – दराज से आने वाले दर्शकों की भीड़ मेले में उमड़ पड़ी। बच्चों के लिए लगे झूले, खिलौनों और मिठाइयों की दुकानों ने पूरे क्षेत्र का माहौल उत्सवमय बना दिया। मेले की सबसे खास पहचान विशाल दंगल रहा। दोपहर बाद शुरू हुए दंगल का उद्घाटन मोहम्मदपुर गौंती गांव के समाजसेवी एवं भावी प्रधान प्रत्याशी मोहम्मद सफी ने दंगल प्रभारी इश्तियाक बेग उर्फ भट्टू भाई, यूसुफ मंसूरी, दंगल रेफरी मोतीलाल पहलवान, एनाउंसर सुहैल अहमद पूर्व प्रधान शोहदमऊ, अबरार अहमद, इंद्रजीत मौर्य, कामता प्रसाद, राहुल साहू, मुन्ना सिंह गौतम, जुल्फेकार अली सहित कई अन्य संभ्रांत लोगों ने किया। जनपद व गैर जनपद के कई पहलवानों ने अखाड़े में उतरकर अपने दांव पेंच का जोर दिखाया। पहलवानों की भिड़ंत देख दर्शकों में उत्साह चरम पर रहा और चारों ओर तालियों व जयकारों की गूंज सुनाई दी। कई पहलवानों ने मैदान में उतरकर कुश्ती लड़ी जिसमें सबसे ज्यादा रोमांचक भद्दा पहलवान नरैनापुर और जय सिंह की रही जोकि बिना हार – जीत के बराबरी पर तय हुई। हालांकि इस कुश्ती में जय सिंह को चोट भी आई।
इस दौरान मेला अध्यक्ष विजय महाराज सहित अन्य आयोजकों ने बताया कि मेला दो दिनों तक चलेगा। दोनों दिन दंगल का आयोजन होगा। वहीं, स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात की विशेष व्यवस्था की है। पुलिस बल लगातार गश्त करता रहा है ताकि किसी तरह की अव्यवस्था न होने पाए। मेला समिति के जिम्मेदार सदस्य एवं दंगल प्रभारी इश्तियाक बेग उर्फ भट्टू भाई ने बताया कि यह मेला न सिर्फ मनोरंजन का साधन है बल्कि हमारी परंपराओं और भाईचारे को जीवित रखने का माध्यम भी है। हर साल यहां से सामाजिक एकजुटता का संदेश जाता है। आगे भट्टू भाई ने बताया कि बुधवार (आज) आयोजित होने वाली कुश्ती रोमांचक होंगी जिसमें विभिन्न प्रांतों के पहलवान भाग लेंगे। वहीं आगे बताया कि आज की बड़ी  कुश्ती 5100 रुपए तक की होगी। मेले में शामिल ग्रामीणों ने बताया कि वे हर साल इस मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं। बच्चों के लिए जहां यह आनंद का अवसर होता है, वहीं बुजुर्गों के लिए परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को जीने का मौका होता है।