Home उत्तर प्रदेश 2018 में नौकरी पक्की, लेकिन 2008 से ही उठा लिया चयन वेतनमान

2018 में नौकरी पक्की, लेकिन 2008 से ही उठा लिया चयन वेतनमान

KUSHINAGAR NEWS: खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। जिन शिक्षकों का विनियमितीकरण वर्ष 2018 में हुआ, उन्होंने चयन वेतनमान का लाभ वर्ष 2008 से ही लेना शुरू कर दिया। यानी पात्रता से बीस साल पहले सरकारी सुविधा का लाभ।अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह चमत्कार कैसे हुआ? किस अधिकारी ने आंख बंद कर फाइलों पर हस्ताक्षर किए? और किसके संरक्षण में सरकारी धन को इस तरह लुटाया गया? सूत्र बताते हैं कि फर्जी दस्तावेजों और कूटरचित अभिलेखों के सहारे पूरा खेल खेला गया। लेकिन विभागीय अफसर ऐसे चुप बैठे है जैसे उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा हो।
शिक्षा निदेशालय ने पकड़ी गड़बड़ी, फिर भी कार्रवाई नहीं
मामला तब खुला जब शिक्षा निदेशालय ने जांच में पाया कि संबंधित शिक्षकों की कार्यरता संदिग्ध है। निदेशक माध्यमिक शिक्षा के पत्र में साफ लिखा गया कि मूल उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर नहीं पाए गए, इसलिए कार्य प्रमाणित नहीं होता।स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि “नो वर्क, नो पे” के सिद्धांत के अनुसार भुगतान नियमसंगत नहीं है।वित्त नियंत्रक ने भी चेतावनी दी है कि यदि अनियमित भुगतान हुआ तो संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षक और वित्त लेखाधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। बावजूद इसके न भुगतान रुका, न वसूली हुई और न किसी पर कार्रवाई।यानी शासन के आदेश फाइलों में पड़े रहे और सरकारी धन निकलता रहा।
आईजीआरएस पर ‘सच का पोस्टमार्टम’
सबसे सनसनीखेज आरोप तब सामने आया जब  पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल आईजीआरएस पर की गई। जांच के लिए प्रधानाचार्य से रिपोर्ट मांगी गई।
प्रधानाचार्य ने करीब 20 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी, जिसमें
मूल उपस्थिति पंजिका,जांच रिपोर्ट,शिक्षा निदेशक के आदेश,वित्त नियंत्रक के पत्र, और फर्जी भुगतान से जुड़े तमाम साक्ष्य शामिल थे।
लेकिन आरोप है कि डीआईओएस श्रवण कुमार गुप्त ने उन दस्तावेजों को दबा दिया और आईजीआरएस पर मात्र एक पन्ने की ऐसी रिपोर्ट अपलोड कर दी, जिसमें पूरे मामले को हल्का दिखाने की कोशिश की गई। यानी जनता जिस पोर्टल को न्याय का माध्यम समझती है, वहां भी सच को दफनाने का खेल खेला गया।