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20 रजब इमाम हुसैन (अ.स) की लख़्त-ए-जिगर बीबी सकीना (स.अ) की विलादत का दिन:मौलाना अबरार

MIRZAPUR NEWS: (शाहिद वारसी)  20 रजब 56 हिजरी को नबी-ए-अकरम (स.अ.) की नातिन, हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की मासूम और प्यारी शाहज़ादी, दुख़्तर-ए-हुसैन, जिगरगोशा-ए-अब्बास, सैय्यदा बीबी सकीना सलामुल्लाह अलैहा की विलादत हुई थी। इस अवसर पर अल्लामा मौलाना अबरार हुसैन वारसी ने कहा कि बीबी सकीना (स.अ) हज़रत इमाम हुसैन (अ.स) की सबसे छोटी और सबसे मासूम शाहज़ादी थीं, जो अपनी मासूमियत, सब्र और इलाही रज़ा पर राज़ी रहने की मिसाल हैं। वाक़िए-कर्बला के बाद उन्हें अहलेबैत अलैहिस्सलाम के साथ क़ैद कर लिया गया। यतीमी, भूख-प्यास, ज़ुल्म और बेड़ियों का दर्द सहते हुए दमिश्क के ज़िंदान में उन्होंने अपने बाबा इमाम हुसैन (अ.स.) के मुक़द्दस सर को सीने से लगाकर सदा के लिए सो गई। इस मौके पर अंजुमन अंसार-ए-हुसैन के नौहाख़्वान इरशाद अली ने कहा कि बीबी सकीना (स.अ.) वह अज़ीम बच्ची हैं जिनको इमाम-ए-हुसैन (अ.स.) ने नमाज़-ए-शब में दुआओं के ज़रिये रब से मांगा था। 10 मोहर्रम, मैदान-ए-कर्बला में जब मासूम सकीना (स.अ.) की प्यास ने ख़ैमे-ए-हुसैन को बेचैन किया, तो उनके चाचा हज़रत अब्बास अलमबरदार (अ.स.) नहर-ए-फ़ुरात से पानी लाने निकले, मगर यज़ीदी फ़ौज ने उन्हें शहीद कर दिया। बीबी सकीना (स.अ) अपने चाचा अब्बास (अ.स) की बेहद लाड़ली थीं। बीबी सकीना (स.अ) के मसाइब इतने दर्दनाक हैं कि आज भी जब उनका ज़िक्र किया जाता है तो हर अज़ादार की आंखें नम हो जाती हैं। उनका किरदार यज़ीदियत के ख़िलाफ़ इंसानियत, हक़ और सच्चाई का पैग़ाम देता है। बीबी सकीना (स.अ) ने महज़ चार साल की उम्र में इतने जुल्म सहे जो तारीख के पन्नों में दर्ज है। कर्बला से कूफ़ा और कूफ़ा से मुल्क-ए-शाम तक उन्हें रस्सियों और ज़ंजीरों में जकड़कर क़ैदी बनाकर ले जाया गया। ऊँटों की पीठ पर बैठाया गया, कानों की बालियाँ नोची गईं, मासूम चेहरे पर तमाचे मारे जा रहे थे। कूफ़ा और शाम के बाज़ारों में जब-जब कोई ज़ालिम बीबी सकीना (स.अ.) पर हाथ उठाता था तब वो अपने चाचा मौला अब्बास (अ.स) को पुकारती थीं। कूफ़ा से शाम तक का सफ़र याद किया जाए तो दिल दहल जाता है और आंखों से आसू जारी होने लगता है। वह मासूम सकीना (स.अ) जिसने कभी रेत की तपिश तक न जानी थी, नंगे पांव ज़िंदान-ए-शाम तक ले जाई गई थीं। ज़िंदान-ए-शाम में ही इस चार साल की बच्ची ने ज़ुल्मों से टूटकर शहादत पाई, मगर इस्लाम को बचा लिया। बीबी सकीना (स.अ.) की ज़िंदगी में फ़ज़ाइल से ज़्यादा मसाइब है।