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Home उत्तर प्रदेश 14 अगस्त: बंटवारे का वह बदनुमा अध्याय, जिसकी टीस आज भी जिंदा...
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14 अगस्त: बंटवारे का वह बदनुमा अध्याय, जिसकी टीस आज भी जिंदा है

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प्रातः काल न्यूज नेटवर्क
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August 13, 2026
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    एक लकीर ने मुल्क बांट दिया, लेकिन सदियों पुराने रिश्ते और साझा विरासत नहीं बांट सकी

    दो-कौमी सिद्धांत की राजनीति के बीच करोड़ों मुसलमानों ने भारतीय संविधान, लोकतंत्र और अपनी मातृभूमि पर भरोसा कायम रखा
    SAHARANPUR NEWS: (फहीम अहमद राज़ सहारनपुरी) 14 अगस्त आते ही पाकिस्तान अपने स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाता है। लेकिन भारतीय मुसलमानों के लिए 14 अगस्त केवल एक तारीख नहीं, बल्कि इतिहास के उस भयावह अध्याय की याद भी है, जिसने उपमहाद्वीप की आत्मा को गहरे तक घायल किया। 1947 का विभाजन केवल जमीन का बंटवारा नहीं था; यह परिवारों, रिश्तों, शहरों, गांवों, यादों और सदियों पुरानी साझी संस्कृति का भी विभाजन था। लाखों लोग रातों-रात अपने ही घरों में पराये हो गए और असंख्य परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया। इस त्रासदी को केवल हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। विभाजन का दर्द दोनों समुदायों ने झेला। लेकिन भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में इसकी पीड़ा कुछ अलग और अधिक जटिल है। जिस ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ के नाम पर पाकिस्तान बना, उसका सबसे बड़ा सवाल यही था कि जो मुसलमान भारत में रह गए, उनका भविष्य क्या होगा? भारतीय मुसलमानों के एक बड़े हिस्से ने पाकिस्तान को अपना भविष्य नहीं चुना। उन्होंने भारत को अपना वतन माना, यहीं रहने का फैसला किया और संविधान, लोकतंत्र तथा साझा भारतीय पहचान पर अपना विश्वास कायम रखा। इसीलिए 14 अगस्त को भारतीय मुसलमानों के लिए आत्ममंथन का दिन भी होना चाहिए। पाकिस्तान का निर्माण किसी एक समुदाय की सामूहिक इच्छा का परिणाम नहीं था और न ही भारत के हर मुसलमान की पसंद। करोड़ों भारतीय मुसलमानों ने विभाजन के बावजूद भारत को चुना। उनके पूर्वजों की मिट्टी, उनकी भाषा, उनकी संस्कृति, उनकी कब्रें, उनके रिश्ते और उनकी स्मृतियां इसी देश से जुड़ी थीं। इसलिए किसी भारतीय मुसलमान को पाकिस्तान के निर्माण के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराना इतिहास के साथ अन्याय है। विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि राजनीति ने जिस सीमा को नक्शे पर खींचा, उसने इंसानों के दिलों पर ऐसी लकीर खींच दी जिसकी टीस आज भी महसूस होती है। पंजाब और बंगाल से लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और सिंध तक अनगिनत परिवार उजड़ गए। ट्रेनें लाशों से भरी हुई पहुंचीं, घर जलाए गए, महिलाओं ने असहनीय यातनाएं झेलीं और बच्चों ने अपने माता-पिता को खोया। यह सब किसी एक धर्म की त्रासदी नहीं थी; यह इंसानियत की पराजय थी। इसलिए 14 अगस्त को केवल पाकिस्तान की स्थापना की तारीख के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि जब राजनीति धर्म, भय और नफरत को हथियार बना लेती है तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आम इंसान उठाता है। विभाजन ने यह साबित कर दिया कि नफरत के बीज बोना आसान है, लेकिन उसके परिणाम पीढ़ियों तक भुगतने पड़ते हैं। भारतीय मुसलमानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भारत में रहना किसी मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों का ऐतिहासिक और भावनात्मक निर्णय था। उन्होंने विभाजन के बाद भी इस देश के संविधान को स्वीकार किया, लोकतंत्र में विश्वास रखा और भारत की बहुलतावादी संस्कृति को अपना घर माना। भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति का प्रमाण किसी दूसरे देश के प्रति नफरत नहीं, बल्कि अपने देश के प्रति जिम्मेदारी, संविधान के प्रति आस्था और समाज के प्रति योगदान है। 14 अगस्त हमें पाकिस्तान से ज्यादा अपने भीतर झांकने का अवसर देता है। इतिहास को भूलना नहीं चाहिए, लेकिन इतिहास की नफरत को वर्तमान की पीढ़ियों पर भी नहीं थोपा जाना चाहिए। विभाजन का जख्म याद रहना चाहिए ताकि वैसी गलती दोबारा न हो; मगर उस जख्म को कुरेदकर नई नफरत पैदा करना इतिहास से सीखना नहीं, इतिहास को दोहराना है।
    सच यही है कि 14 अगस्त की रात ने उपमहाद्वीप को दो देशों में बांट दिया था, लेकिन इंसानी रिश्तों को पूरी तरह नहीं बांट सकी। आज भी दोनों ओर के लोगों की भाषाओं में समानता है, खान-पान में समानता है, संगीत में समानता है, साहित्य में समानता है और सबसे बढ़कर उनकी साझा ऐतिहासिक स्मृतियां हैं। इसलिए 14 अगस्त को भारतीय मुसलमानों के लिए ‘सबसे बदनुमा धब्बा’ कहने का अर्थ किसी धर्म या समुदाय को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक त्रासदी को याद करना है जिसने भारतीय मुसलमानों सहित पूरे भारतीय समाज को गहरा दर्द दिया। यह धब्बा हमें नफरत की राजनीति के खिलाफ चेताता है और यह याद दिलाता है कि मुल्क नक्शे से नहीं, लोगों के विश्वास, साझी विरासत और संविधान से बनते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि हम 1947 को एक-दूसरे के खिलाफ हथियार बनाने के बजाय एक चेतावनी की तरह याद करें। आने वाली पीढ़ियों को बताएं कि धर्म के नाम पर खींची गई सरहदें इंसान की पीड़ा को खत्म नहीं करतीं। असली जीत तब होगी जब 14 अगस्त हमें जश्न या मातम से आगे ले जाकर इंसानियत, भाईचारे और उस भारत की रक्षा का संकल्प दे, जिसे करोड़ों लोगों ने विभाजन की आग के बावजूद अपना घर चुना था।

    फोटो: फहीम अहमद राज़ सहारनपुरी
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