PRAYAGRAJ NEWS: शहंशाह-ए-तरन्नुम मोहम्मद रफी के देहावसान के 45 वर्ष हो चलें। लेकिन उनके मुख्य धारा हिंदी गानों के अतिरिक्त गजल, भजन, देशभक्ति गीत, कव्वाली और अन्य भाषाओं में गाये गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक व लोकप्रिय हैं।
इसी कड़ी में 31 जुलाई की शाम में बाल भारतीय स्कूल में श्याद -ए- रफीश् का आयोजन हुआ। जिसमें वरिष्ठ कवि देवी प्रसाद मिश्र ने अपना वक्तव दिया । देवी प्रसाद ने रफी साहब को मानवीय उत्सवों के गायक के रूप में संबोधित करते हुए उनके सांस्कृतिक – सामाजिक और राजनीतिक महत्ता को उजागर किया। देवी प्रसाद मिश्र जी ने वक्तव्य में कहा कि मोहम्मद रफी के जाते ही गीतात्मक संवेदना का स्तर बहुत गिर गया। गीत उथले हो गए, गीतों में आत्मीयता नष्ट हो लगी, रोमांस के उच्छवास निः श्वास की कविता का अंत हो गया । यह महत्त्वपूर्ण बात है कि जो गाने मोहम्मद रफी का व्यक्तित्व लिखवा रहा था उनके जाते ही उस सांगीतिक और शाब्दिक परंपरा का मेयार गिर गया। बहुत ज्यादा गिर गया। मोहम्मद रफी के इस दुनिया से रुखसत होते ही शायरी का, कविता का, नज्म का, गजल का स्तर गिर गया। अंतर्वस्तु लगभग खत्म हो गई । संजीदगी लापता हो गई, जेहनियत जाती रही । मोहम्मद रफी की शख्सियत जो बहुत सारी आत्माओं और मन को झिंझोड़ने और विचलित करने वाला जो काम करवा रही थी, जब मोहम्मद रफी नहीं रहे तो गानों की धुन बदल गई , तौर तरीके बदल गए, शोर शुरू हो गया । यह गायकी में संवेदना और अंतर्वस्तु और आत्मन की मृत्यु थी। डेथ ऑफ म्यूजिक । और रफी के न रहने के बाद का औसतपन आज तक जारी है। उस झटके से हिंदी का फिल्म संगीत उबर नहीं पाया है। देवी के वक्तव्य के बाद मोहम्मद रफी द्वारा गाए गए गीतों की प्रस्तुति हुई जिनमें डॉ.एस.पी. मिश्र, देवराज त्रिपाठी, अंकिता चतुर्वेदी, पद्मभूषण, पंकज, महुआ, श्रेयस नायर, एड. अवनीश सिंह, उत्पला शुक्ला, विवेक सुल्तानवी आदि ने श्लाखों हैं दीवाने जिंदगी की राह मेंश्, श् गुलाबी आंखेश्, श् लिखें जो खत तुझेश्, श् क्या हुआ तेरा वादाश्, श् अभी न जाओ छोड़ करश्, श् एहसान तेरा होगा मुझ परश्, श् पुकारता चला हूं मैं श्, श् तेरी आंखों के सिवाश्, श् ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो श् आदि दर्जनों गीत गाए। संक्षिप्त में कहें तो माहौल रफीमय था। आयोजन समिति में – हरीशचन्द्र पांडे, अनीता गोपेश, प्रियदर्शन मालवीय, प्रणय कृष्ण, अशरफ अली बेग, समिति बसंत त्रिपाठी, संध्या नवोदिता, प्रेमशंकर सिंह, अंकित अमलतास, पद्मभूषण और संगीत – यूसुफ अजीज व संयोजक- अंशु मालवीय ने आयोजन को सफल बनाने में अपनी भूमिका निभाई।श्रोताओं में कवि हरीशचंद्र पांडे, प्रो. पंकज कुमार, आनंद मालवीय, प्रियदर्शन मालवीय, सुरेंद्र राही, अनीता त्रिपाठी, प्रतिमा रानी सिंह, लक्ष्मण प्रसाद गुप्त, अमितेश, स्मृति सुमन, अंकित पाठक,निकिता, सलोनी, खुशी, अजीजु निसा,हर्षिता, स्वतंत्र, आदर्श, अभिषेक, सुमित, अश्विन, आशुतोष, शिवम, विवेक आदि ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।







