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हज ट्रेनिंग कैंप: एहराम की हालत में बहुत सी चीजें हम पर हो जाती है हराम

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वाराणसी। इसरा (ISSRA) वाराणसी यूपी की ओर से 29.03.2026 दिन रविवार से स्पेशल हज ट्रेनिंग कैम्प उल्फत कंपाउंड अर्दली बाजार में शुरू हुआ था। आज दूसरे रविवार 05.04.2026 को हज ट्रेनिंग कैम्प मौलाना अब्दुल आदी खां हबीबी की अगुवाई व मायनाज ओलमा की मौजूदगी में सकुशल सम्पन्न हुआ। मुख्य ओलमा मौलाना हसीन हबीबी साहब, मौलाना मुबारक, हाफिज गुलाम रसूल, शायर सैय्यद असफर अली आदि ने अपने खयालात का इज़हार किया।

शुरूआत हाफिज गुलाम रसूल ने तिलावते कलाम पाक से की। इस ट्रेनिंग कैम्प में मौलाना मुबारक ने एहराम के बारे में बताते हुए कहा कि एहराम कपड़े का नाम नहीं है जिसमें नियत करने के बाद एहराम की हालत में बहुत सी चीजें हम पर हराम हो जाती है:- (1) औरत से सोहबत. (2) बोसा लेना, (3) गले लगाना, (4) किसी से लड़ाई झगड़ा करना, (5) जंगल का शिकार, (6) अपना या दूसरे का नाखून कतरना या दूसरे से अपना कटवाना, (7) मुँह या सिर किसी कपड़े आदि से छिपाना, (8) गठरी सिर पर रखना, (9) खुश्बू बालों, बदन या कपड़ों में लगाना, (10) अमामा। मौलाना हसीन अहमद हबीबी ने मिकात के बारे में बताते हुए कहा कि मिकात 5 प्रकार की होती है। 1. जुल हुलैफा 2. यलम-लम, 3. जुहूफा, 4. कर्नुल माजिल 5. जाते इर्क। जिसमें जुल हुलैफा मदीन-ए-मुनव्वरा से मक्का शरीफ आने वालों के लिए मिकात है और यलम-लम पाकिस्तान व हिन्दुस्तान से मक्का शरीफ जाने वालों के लिए मिकात है। और उन्होंने कहा कि किसी सूरत में भी मिकात के अंदर आप बिना एहराम के दाखिल नहीं हो सकते हैं। अगर दाखिल हो गये तो दम लाजिम हो जायेगा और दम (कुर्बानी) देना पड़ेगा। मौलाना हसीन हबीबी ने हज के बारे में बताते हुए कहा कि हज भी नमाज, रोजा, क्रमशः-2 और जकात की तरह इस्लाम का एक अहम फरीजा और पाँचवा रूक्न है हैसियत वाले आकिल, बालिग, मुसलमान मर्द व औरत पर उम्र में एक बार हज फर्ज है। हज तीन तरह का होता है (1) हज्जे किरान, (2) हज्जे तमत्तो (3) हज्जे इफराद। 1. हज्जे किरान- 1. ये सबसे अफजल है। इस हज के अदा करने वाले को कारीन कहते हैं। इसमें उमरह और हज का एहराम एक साथ बाँधा जाता है। 2. हज्जे तमत्तो- यह हज मीकात के बाहर से आने वाले अदा कर सकते हैं मसलन पाकिस्तान या हिन्दुस्तान से आने वाले हाजी अमूमन हज्जे तमत्तो ही किया करते हैं क्योंकि इससे ये आसानी है कि इसमें उमरह तो होता ही है। लेकिन उमरह अदा करने के बाद हलक या कस्र करवाके एहराम खोल दिया जाता है और आठ जिलहिज्जा या उससे कब्ल हज का एहराम बाँधा जाता है। 3. हज्जे इफराद- इस हज में उमरह शामिल नहीं है। इसमें सिर्फ हज का एहराम बाँधा जाता है। ये हज मीकात और हुदुदे हरम के दरमियान रहने वाले लोग हज्जे इफराद करते हैं।

ख़्वातीन की अलग हुई है ट्रेनिंग
औरतों में लेडीज ट्रेनर सैय्यदा खानम, निकहत फातमा व अनम फातमा मौजूद थी। सैय्यदा खानम ने औरतों के एहराम के बारे में बताते हुए कहती है कि औरतों के एहराम उनके अपने सिले हुए कपड़े ही हैं वे हस्बे मामूल सिले हुए कपड़े पहनने दस्ताने व मोजे भी पहन सकती हैं। एहराम की हालत में औरतों को सिर ढॉकना जरूरी है मगर चेहरे को चादर से नहीं ढ़क सकती। एहराम की हालत में औरतों को ये चीजें मना है जैसे अजनबी मर्द के सामने बेपर्दा होना, तलबिया जोर से पढ़ना, तवाफ में इज्तिबा और रमल करना सई में मीलैन के दरमियान दौड़ना, मर्दो के हुजूम के वक्त हजरे असवद को बोसा देना। यह सब उमूर मना है।

इनकी रही खास मौजूदगी
खुसूसी तौर पर मर्दो में वाराणसी से मोहम्मद साजिद, गुलाम रसूल, मोहम्मद युनूस, शोहराब आलम, मोहम्मद युसूफ, हफीजुल्लाह, मोहम्मद मुबारक फिरोज अहमद, अब्दुल सलाम, गाजीपुर से मोहम्मद हनीफ, मोहम्मद अमीन, खुर्शीद सिद्दीकी, चन्दौली से अब्दुल बारी, इमरान, फिरोज अहमद, वहीदुल्लाह, अब्दुल हफीज भदोही से मोहम्मद निजामुद्दीन, मोहम्मद शेख शफीक, औरतों में साजिदा बेगम, अनवरी बेगम, खलीकुन्न निशा, आसमां बेगम, नूरजहां, आसिया खातून, निकहत सुलताना, अंजूम, रूबीना बानो, नसरीन तथा इसरा के अन्य सदस्य एवं पदाधिकारीगण मौजूद थे।