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सेना-गार्जियंस ऑफ द नेशन-एक पिता और बेटे की देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत मार्मिक कहानी

डाक्टर तबस्सुम जहां

PRAYAGRAJ NEWS: प्राइम टाइम पर 13 अगस्त को रिलीज़ हुई डायरेक्टर अभिनव आनंद की वेबसीरीज़ सेना – गार्जियंस ऑफ द नेशन अपने विषय और अभिनय को लेकर आजकल खूब चर्चा मे है। शुरु से अंत तक यह सीरीज़ पुत्र पिता उसके परिवार और सेना व देश के प्रति उसके कर्तव्य के ताने बाने पर बुनी हुई है। वेब सीरीज़ मे मुख्य विलेन हमज़ा का पकड़ा न जाना और रूप बदलकर दूसरे मुल्क भागना यह संकेत देता है कि आतंक कभी जड़ से ख़त्म नहीं होता बल्कि रूप बदल कर भविष्य मे एक नई चुनौती के रूप मे फिर से खड़ा हो सकता है। वेबसीरीज़ यह भी ध्यान दिलाती है कि आर्मी की ऊँची रेंक मे शामिल होने के लिए देश के लिए मर मिटने के जज़्बे के साथ साथ बहुत ऊँचे दर्जे की नॉलेज, ध्येय, तार्किक शक्ति, अनुशासन और शारीरिक फिट रहना बहुत ज़रूरी है। इंडियन आर्मी का फॉर्म भरने से लेकर ssb के अंतिम राउंड क्लियर करने तक पूरी जानकारी दर्शकों को मिलती है। अतः जो इंडियन आर्मी मे जाना चाहते हैं उनको यह वेबसीरीज़ ज़रूर देखना चाहिए। सीरीज़ के पात्रों की बात करें तो यशपाल शर्मा का किरदार अन्य सभी पर भारी पड़ा है। एक पिता के रोल मे उन्होंने अलग अलग शेड निभाए हैं। वह एक वातसल्य से भरे पिता हैं अपने बेटे के आर्मी मे जाने से उसकी नाराज़ हैं और उसके प्रति मे सख्त हो जाते है। नाराज़गी दूर हो जाती है और वह अपने पुत्र के आर्मी मे जाने पर गर्व अनुभव करते हैं लेकिन बता नहीं पाते और एक कागज़ पर अपने इमोशन्स लिख देते हैं। आतंकी से हुई मुठभेड़ और कैद होने व भागने तक वह अंत तक बेटे के साथ बने रहते हैं और बराबर दुःख दर्द को सहते है। पिता पुत्र के अनेक दृश्य बहुत ही बेजोड़ और मार्मिक हैं। जिन्हें देख कर दर्शकों की आँखें भीग जाती हैं।
कार्तिक बने विक्रम सिंह चौहान ने एक आर्मी के रूप मे बहुत शानदार अभिनय किया है। कहीं कहीं तो यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि यह अभिनय है या वास्तव मे हम किसी आर्मी ऑफिसर को देख रहे हैं। जब देश की सुरक्षा प्राथमिक हो और दूसरी ओर पिता हों तो उस समय एक पुत्र के लिए बहुत विकट स्थिति होती है। लेकिन विक्रम सिंह ने आर्मी ऑफिसर और पुत्र के बीच एक ज़बरदस्त सामंजस्य बना कर रखा है। अभिनय का कोई भी ऐसा सूत्र नहीं जिसको उन्होंने बारीकी से न पकड़ा हो। आई एस आई एजेंट बने हमज़ा बनाम राहुल तिवारी ने अपने किरदार मे खूब मेहनत की है उनके अभिनय से अंत तक पता नहीं चलता कि वो ज़ालिम हैं या मज़लूम।
इसके अलावा अनुपम भट्टाचार्य नीलू डोगरा विजय विक्रम सिंह शेरली सेतिया भी अपने अपने किरदारों को ख़ूब सूरती से निभाया है
इस फ़िल्म का सबसे शानदार पक्ष सिनेमाटोग्राफी रहा। अश्विन कादंबूर ने अपने कैमरे और उसके छायाँकन से परदे पर एक एक दृश्य को सजीव कर दिया है। मिलिट्री आतंकी मुठभेड़ और उससे जुड़े स्टंट को विकी अरोड़ा ने बखूबी अंजाम दिया है। वेबसीरीज़ फ़्लेशबैक और वर्तमान दोनों पटल पर साथ साथ चलती है जिससे इसकी कथा को समझने मे सहायता मिलती हैं अच्छी बात यह है कि पहले दृश्य से अंतिम दृश्य तक रोचकता, सस्पेंस बनी हुई हैं जिसका श्रेय जाता है फ़िल्म के राइटर आनंदेश्वर द्विवेदी, अरुणाभ कुमार को। कुल मिलाकर एक मुज़बूत कहानी और मँझे हुए निर्देशन और अपने ज़बरदस्त अभिनय से यह वेब सीरीज़ अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। वेबसीरीज़ की कसावट काबिले तारीफ़ है। हालांकि अंत मे अतिशय खून ख़राबा दिखा दिया गया है जिसके बिना भी काम चलाया जा सकता था। लेकिन इसमें एक पुत्र का अपने पिता के असमय जाने का क्रोध साफ नज़र आता है। इसके अलावा यह वेबसीरीज़ कहानी, निर्देशन और तकनीकी रूप से अच्छी बन पड़ी है।