गोरखपुर जनता दर्शन में सीएम का निर्देश: विदेश भेजने के नाम पर ठगी करने वालों को भेजें जेल, दिलवाएं पैसा
FATEHPUR NEWS: (सैय्यद शारिब क़मर अज़मी) बीते दिनों गोरखपुर में जनता दर्शन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विदेश भेजने के नाम पर युवाओं को ठगने वाले ‘कबूतरबाजों’ (अवैध ट्रैवल एजेंटों) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। सीएम ने पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि ऐसे ठगों को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेजा जाए और पीड़ितों का पैसा वापस दिलवाया जाए। मुख्यमंत्री की मंशा साफ है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन, सीएम के इस सख्त फरमान के बाद जमीनी हकीकत और पुलिस की पुरानी कार्यशैली ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में पुलिस विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘डेटा का अभाव’ है। दरअसल, अब तक पुलिस के पास कबूतरबाजों का कोई व्यवस्थित थानावार रिकॉर्ड या ‘डेटाबेस’ मौजूद ही नहीं है। जानकारों का कहना है कि जब भी कोई पीड़ित ठगी की शिकायत लेकर थाने पहुंचता है, तो पुलिस अक्सर उसे ‘लेन-देन का मामला’ बताकर टालने की कोशिश करती है। ज्यादातर मामलों में एफआईआर दर्ज करने के बजाय थाने के भीतर ही दोनों पक्षों को बैठाकर ‘समझौता’ करा दिया जाता है। इस ‘समझौता संस्कृति’ के कारण ठग का नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता जिससे ठग थाने से छूटते ही दूसरे शिकार की तलाश में लग जाता है और कबूतरबाजों का हौसला बढ़ता है क्योंकि उन्हें जेल जाने का डर खत्म हो जाता है।
अब देखना यह होगा कि पुलिस प्रशासन सीएम की सख्ती को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए होगी, या वाकई कबूतरबाजों की फाइलों से धूल हटाई जाएगी? जनता की निगाहें अब पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
ठंडे बस्ते से निकलेंगी फाइलें?
सीएम के आदेश के पालन के लिए पुलिस को अब लकीर के फकीर वाली शैली छोड़नी होगी। सवाल यह है कि क्या अब पुलिस उन पुराने शिकायती पत्रों को दोबारा खंगालेगी, जिनमें समझौता कराकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया था? अगर पुलिस को वास्तव में कबूतरबाजों की कमर तोड़नी है, तो उसे पिछले 2-3 वर्षों में आए ऐसे सभी शिकायती पत्रों की समीक्षा करनी होगी और थानावार कबूतरबाजों का ‘हिस्ट्री रजिस्टर’ तैयार करना होगा।
क्या कहते हैं कानूनी पेंच?
विदेश भेजने के नाम पर ठगी सिर्फ पैसों का लेन-देन नहीं, बल्कि एक गंभीर आपराधिक कृत्य है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार, पुलिस अक्सर इसे सिविल मामला मानकर गलती करती है। इसमें कई कानूनी धाराएं लागू होती हैं जैसे धोखाधड़ी (IPC 420 / BNS 318) जो झूठे वादे करके पैसा ऐंठना एक गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आ सकता है। अमानत में खयानत (IPC 406 / BNS 316) जो विश्वासघात कर पैसा हड़प लेना होता है। इमीग्रेशन एक्ट 1983 जो बिना लाइसेंस के विदेश भेजने का काम करना या भर्ती एजेंट बनना अपने आप में एक अपराध है। धारा 10 और 24 के तहत इसमें सजा का प्रावधान है। तथा पासपोर्ट एक्ट जिसमें अगर फर्जी दस्तावेज या पासपोर्ट का इस्तेमाल हुआ है, तो यह मामला और गंभीर हो जाता है।
आगे की राह: पुलिस को करना होगा ये काम
अगर सीएम योगी के निर्देशों का अक्षरशः पालन करना है, तो जिला पुलिस को तत्काल प्रभाव से एक ‘एंटी-फ्रॉड सेल’ या विशेष अभियान चलाना होगा। हर थाने में कबूतरबाजों की सूची तैयार करनी होगी।
पुराने मामलों, जिनमें समझौता हुआ है, उनकी दोबारा जांच करनी होगी कि क्या वादे के मुताबिक पैसा लौटाया गया या नहीं।
– सिर्फ पैसा वापस दिलाने तक सीमित न रहकर, इमीग्रेशन एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करना होगा ताकि इनका नेटवर्क टूट सके।
जनता के लिए एक सवाल
क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ विदेश भेजने के नाम पर ठगी हुई है और पुलिस ने एफआईआर के बजाय समझौता करा दिया?







