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वायरल होने का संगम है धार्मिक माघ मेला ? रील, मीम की भीड़ में कहीं खो न जाए मेले की आस्था,

उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया जाना पुरानी परंपरा अपने देश मे रही है।
लेकिन

डिजिटल युग में अब सम्मान का पैमाना बदल चुका है।
अब पुरस्कार मेहनत, त्याग या साधना का नहीं — वायरल होने का है।

PRAYAGRAJ NEWS: (इरफान खान) संगम की धरती, जो सदियों से तप, त्याग और धर्म की साक्षी रही है, आज एक नई भीड़ दिख रही है — वायरल होने आई भीड़।
महाकुंभ 2025 जहां साधना से ज्यादा कैमरा चमका
महाकुंभ 2025 में जौनपुर के मडियाहू से आया एक युवक दातुन बेचने आया।
उसने कहा— “प्रेमिका के लिए पैसे कमाने आया हूँ।”
बस, यही लाइन थी…
और वह वायरल हो गया।
कुछ ही दिनों में टीवी स्टूडियो, चैनल, इंटरव्यू, शो—आज वह सेलिब्रिटी है।
इसी तरह एक मोनालिसा नाम की युवती, माला बेचने आई,
उसकी आंखें वायरल हुईं,
फिर फिल्में मिलीं,
और आज उसकी जिंदगी लग्ज़री में बदल गई।
महाकुंभ में आए हजारों साधु, संत, कल्पवासी, तपस्वी —
उनकी साधना कैमरे के फ्रेम में कम आया,
क्योंकि वह ट्रेंडिंग नहीं थी।
छोटू बाबा: वायरल हुए, पर बाबा ही रह गए
तीन फीट के छोटू बाबा भी आए।
खूब खबरें बनीं, स्टोरी चलीं,
कुछ दिन शोर रहा…
फिर सब खत्म।
दातुन बेचने वाला आगे बढ़ गया,
मोनालिसा आगे निकल गई,
और छोटू बाबा वहीं रह गए।
यही है रील का धर्म —
जहां आस्था नहीं, एल्गोरिदम तय करता है किसे आगे बढ़ना है।
माघ मेला 2026: अब प्रयागराज ‘वायरल टूरिज्म’ का अड्डा?
इस साल 2026 माघ मेले में भी कुछ लोग सिर्फ एक उद्देश्य से आए हैं—
“कुछ नहीं तो प्रयागराज से वायरल हो जाएंगे।”
इस वायरल बनने की दौड़ में
किसी को जेल की हवा खानी पड़ी,
तो किसी नाबालिग ने गलत वीडियो डालकर भविष्य खराब कर लिया।
प्रयागराज पुलिस को ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी पड़ी
जो मेले को, संतों को और परंपराओं को बदनाम कर रहे थे।
थार से दातुन बेचने वाला ‘वायरल व्यापारी
अब मेला क्षेत्र में एक नया किरदार आया है—
थार जैसी गाड़ी से घूमता दातुन बेचने वाला।
कहता है—
“विदेशियों को 1000 की दातुन बेचता हूँ।”
अरे भाई!
5 रुपये में पूरी डंडी मिल जाती है,
जिससे 4–5 दातुन बन जाती हैं।
विदेशी संत हों या पर्यटक —उन्हें भी भाव पता है।
पर झूठ बोलो, कैमरे के सामने बोलो,
और रील बन जाए —
बस, यही आज का व्यापार है।
और दुर्भाग्य देखिए—
कुछ मीडिया साथी भी ऐसे झूठ को खबर बना रहे हैं।
यह माघ मेला है, रील मेला नहीं

माघमेला धर्म के लिए है,डिजिटल तमाशे के लिए नहीं। यहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है,
यहां श्रद्धा का संगम है,
यहां आत्मा का शुद्धिकरण होता है —यह कंटेंट क्रिएशन जोन नहीं है।
अगर सावधानी नहीं बरती गई, तो आने वाले समय में
यह धार्मिक मेला
सिर्फ वायरल मेला बनकर रह जाएगा।
आखिर जिम्मेदारी किसकी?
संतों और अखाड़ों को
मेला प्रशासन को
पुलिस प्रशासन को
और सबसे ज़्यादा मीडिया साथियों को सजग रहना होगा।
हर रील खबर नहीं होती,
हर वायरल व्यक्ति महापुरुष नहीं होता।
अंत में एक सवाल
क्या प्रयागराज की पहचान
रील से होगी या ऋषियों से?
मीम से होगी या मंत्र से?
वायरल से होगी या वैराग्य से?
माघ मेला धर्म के लिए है,
ना कि लाइक, व्यू और फॉलोअर्स के लिए।
अब तय हमें करना है—
हम श्रद्धालु रहेंगे या सिर्फ दर्शक बनकर रह जाएंगे।