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मुस्तफा के नूर-ए-एन या हसन या हुसैन नारा ए हैदरी या अली या अली के नारों से गूंजा शहर

प्रतापगढ़:मोहर्रम कमेटी अन्जुमन रज़ा-ए-हुसैन चैरिटेबल ट्रस्ट, अन्जुमन शेरे सुन्नत के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के द्वारा कमेटी के अध्यक्ष आबिद रजा के आवास से हज़रत मोहम्मद मुस्तफा के नवासे हज़रत इमामे हुसैन के 72 शहीदों का मोहर्रम की 10वी० का जुलूस अपनी पुरानी शानो-शौकत के साथ बड़ी अकीदत, मोहब्बत, गम के माहौल में निकाला गया। जुलूस अजीत नगर, पुराना माल-गोदाम. चिलबिला, गोड़े, सदर बाजार, कुसमी, खुसखुसवापुर इत्यादि जगहों से निकल कर चाँदी का बड़ा अलम व बड़ा ताजिया शरीफ चौक घंटाघर पहुंचा जहां पर अन्जुमन रज़ा-ए-हुसैन खुसखुसवापुर के जुलूस में मिलाप हुआ और जुलूस में लोको अखाड़ा, सदर बाजार अखाड़ा, अखाड़ा चिलबिला बाज़ार, अखाड़ा सोनावां, अखाड़ा गोड़े, पल्टन बाज़ार अखाड़ा, जाबांज अखाड़ा कुसमी इत्यादि जगहों के ताजिया व लंगर की सैकड़ो गाड़ियां जुलूस में शामिल हुई जिसमें विभिन्न अखाड़ों ने हज़रत इमाम हुसैन की याद में हैरातअंगेज खेल प्रस्तुत कर रहे थे। जुलूस अपने पुराने रास्ते से होता हुआ चाँदी के बड़े अलम व बड़ा ताजिया के पास अजीत नगर में रोज़ेदारों को इफ्तार कराया गया। उसके बाद जुलूस सीधा रंजीतपुर स्थित कर्बला में सभी ताज़िया शरीफ व अलम शरीफ के फूल को बड़ी अकीदत के साथ कर्बला शरीफ में दफ्न किया गया। इसके बाद कर्बला शरीफ में हज़रत इमाम हुसैन की याद में मजलिसे मोहर्रम का आयोजन किया गया। अन्जुमन रज़ा-ए-हुसैन के अध्यक्ष आबिद रज़ा ने बताया कि यज़ीद एक जालिम बादशाह था
यजीद मज़हब के नाम पर बुरी बाते फैलाना चाहता था, अपनी अय्याशी, जुल्म व सितम को इस्लाम का नाम देना चाहता था लेकिन उसे मालूम था कि वह अपने इस इरादे को पूरा करने में तब तक कामयाब नहीं हो सकता जब तक हज़रत मोहम्मद के नवासे हज़रम इमाम हुसैन उसका समर्थन न करें यह सोचकर उसने आदेश दिया कि इमाम हुसैन से समर्थन लिया जाय और अगर इन्कार करें तो उन्हें कत्ल कर दिया जाय। यज़ीद की तानाशाही के खिलाफ कोई खड़े होने की हिम्मत नहीं कर रहा था। ऐसे में हज़रत इमाम हुसैन 72 साथियों के साथ उठ खड़े हुए और यज़ीद को अपने नाजायज़ मकसद में कामयाब नहीं होने दिया। हज़रम इमाम हुसैन के साथियों ने उनका साथ दिया और यज़ीदी फौज के सामने डटकर खड़े हो गये। यहां तक की 10 मोहर्रम को जिसे आशूरा भी कहते हैं इमाम हुसैन और उनके साथियों ने नमाज़ पढ़ते हुए शहादत को गले लगा लिया। ज़ालिम यज़ीदियों ने उनका पानी तक बन्द कर दिया था, उसने सिर्फ नौजवानों को शहीद नहीं किया बल्कि बूढ़ों को भी शहीद किया, यहां तक की 06 महीने के बच्चे अली असगर को भी अपने बाप की गोद में तीर से निशाना बना दिया। हज़रत इमाम हुसैन की यह कुर्बानी नइन्साफी को खत्म करने के लिये थी। इसलिये हर साल मोहर्रम में इस कुर्बानी की याद सिर्फ मुसलमान ही नहीं मनाते बल्कि हर वह इन्सान मनाता है जो इन्साफ पसन्द है चाहे उसका तालुक्क जिस धर्म जिस मज़हब से हो। बाबा मुनौव्वर हुसैन हशमती साहब ने देश में अमन व चैन के लिये दुआ मांगी,
जुलूस के मौके पर बाबा रशीद अहमद, मो इदरीस मो चांद एडवोकेट निर्भय सिंह, ओम प्रकाश साहू, डा० सारिक खान, मुख्तार राइन, इज़हार हुसैन, इरशाद पठान, मो० यूसुफ सन्ने, मो आज़ाद सिद्दीकी, अन्जुमन शेरे सुन्नत क अध्यक्ष सरवर राइन, अख्तर राइन, मो० अफज़ल सिद्दीकी, शफीक अंसारी, मकसूद, मो० सैफ गोड़े, बिलाल रज़ा, मो० सकलैन रज़ा, महफूज हसन अब्दुल जब्बार, मो० अकरम, मो० अकबर, मो० आफताब, अली रज़ा कौनैन रज़ा, हुसैन रज़ा, मो० अब्बास रज़ा, मिन्टू मुस्तकीम अब्दुल लतीफ तनवीर रजाआदि लोग मौजूद रहे। जुलूस का संचालन बाबा रसीद अहमद साहब ने किया।