KUSHINAGAR NEWS: बुद्ध दुनिया के पहले मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने दुनिया के दुःखों को समझने का सबसे व्यवस्थित प्रयास किया और उसके कारणों और निवारण के रास्तों की तलाश की। बुद्ध का मार्ग जीवन की सार्थकता और शांति की तलाश का मार्ग है। उक्त बातें प्रो० राम सुधार सिंह ने चरथ भिक्खवे-२ के अंतर्गत 05 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक आयोजित सचल कार्यशाला के दौरान बुद्ध के परिनिर्वाण स्थल कुशीनगर में आयोजित परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में कही। उक्त सचल कार्यशाला “बुद्ध की नदी रोहन के साथ चलते हुए ” नामक विश्व शांति के लिए साहित्यिक सांस्कृतिक यात्रा के रूप में प्रोफेसर सदानंद शाही के संयोजन में आयोजित है।प्रोफेसर सिंह ने वावेरू जातक की कथा सुनाते हुए कहा कि जिस राज्य के लोग पक्षी के रूप में सुन्दर और सुनहले पंखों वाले मोर को नहीं जानते वहां कौआ भी बहुमूल्य हो जाता है। इस कथा के साथ उन्होंने ज्ञान के महत्व को समझाया। परिचर्चा को संबोधित करते हुए उच्च शिक्षा संस्थान शिमला की पूर्व चेयरमैन और बीकानेर विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो चंद्रकला पाडिया ने कहा कि बुद्ध को पूजने से ज्यादा इनको पढ़ने की आवश्यकता है। शिक्षा के माध्यम से ही ज्ञान के माध्यम से दुनिया में अज्ञानता से उत्पन्न प्रत्येक प्रकार के अंधकार को नष्ट किया जा सकता है। कार्यशाला के संयोजक प्रो सदानंद शाही ने कहा कि सामान्य रूप से अपने यहां ज्ञान की तलाश में ऋषियों के हिमालय की ओर जाने की परंपरा रही है। बुद्ध हिमालय से मैदान की ओर नदियों की तरह आए। उन्होंने छोटी नदियों के महत्व की भी चर्चा की। कार्यक्रम में प्रो० पंकज चतुर्वेदी, बिहाग वैभव और शिवांगी गोयल आदि ने अपनी कविताएं सुनाई। परिचर्चा का संयोजन और संचालन प्रो० गौरव तिवारी ने किया। कार्यक्रम में पूर्व प्राचार्य प्रो अमृतांशु शुक्ल, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो राजेश कुमार सिंह, मनोज सिंह, डॉ० दीपक, डॉ० रामनवल, डॉ० सौरभ द्विवेदी, डॉ पंकज दुबे, डॉ सुबोध गौतम, डॉ यज्ञेश नाथ त्रिपाठी, डॉ राजीव राय सहित यात्रा के एक दर्जन सहयात्री और विद्यार्थियों ने भाग लिया।







