एरच धाम को माना जाता है होली का पौराणिक उद्गम स्थल, भक्त प्रहलाद की कथा से जुड़ी है परंपरा
FATEHPUR NEWS: सनातन संस्कृति से जुड़ा रंगों का पर्व होली केवल उत्सव ही नहीं बल्कि आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है। बुन्देलखण्ड राष्ट्र समिति के केन्द्रीय अध्यक्ष प्रवीण पांडेय ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सतरंगी होली पर्व की शुरुआत बुंदेलखंड की पावन धरती से मानी जाती है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध बुंदेलखंड के इतिहास में की होली के उद्गम स्थल होने का गौरव भी शामिल है। बताया जाता है कि झांसी जिले के बामौर विकासखंड में स्थित एरच धाम को होली का पौराणिक उद्गम स्थल माना जाता है। झांसी मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान प्राचीन काल में एरिकेच्छ के नाम से जाना जाता था, जो बाद में एरच हो गया। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप दो राक्षस भाई थे और उनकी राजधानी एरिकेच्छ थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र भक्त प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। अपने पुत्र की भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उसे कई यातनाएं दीं और मारने के कई प्रयास किए। इसी कथा से होलिका दहन और होली के पर्व का संबंध बताया जाता है। इतिहासकारों के अनुसार एरच क्षेत्र में बेतवा नदी के किनारे स्थित डिकौली या डिकांचल पर्वत का उल्लेख भागवत कथा में भी मिलता है। झांसी के अंग्रेजी कालीन गजेटियर में भी एरच और डिकौली का उल्लेख किया गया है। यहां मिली होलिका, प्रहलाद और भगवान नरसिंह की मूर्तियां इस क्षेत्र के पौराणिक महत्व को प्रमाणित करती हैं। बुंदेलखंड में होली का पर्व अत्यंत रोमांचक और अनूठी परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यहां गांव-गांव में लठमार होली की परंपरा प्रसिद्ध है, जिसमें युवक रंग और गुलाल के बीच लाठियों के साथ अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। इसके साथ ही पूरे महीने चौपालों में फाग और लोकगीतों की महफिलें सजती हैं। बुजुर्गों के अनुसार बुंदेलखंड में होली की यह परंपरा महाभारत काल से भी जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों को भगवान श्रीकृष्ण ने लाठी युद्ध कला की शिक्षा दी थी और उसी समय होली का पर्व था। तभी से इस क्षेत्र में लाठी और रंगों के साथ होली मनाने की परंपरा चली आ रही है।
आज भी बुंदेलखंड के झांसी, हमीरपुर, जालौन, बांदा, महोबा और चित्रकूट समेत कई जिलों में रंग पंचमी तक होली खेलने की परंपरा जीवित है, हालांकि आधुनिक जीवनशैली के कारण कई स्थानों पर यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है।







