इस्वा के सचिव शकील अहमद ने संपादक को घेरकर दी गालियाँ, साक्ष्य मौजूद
BAREILLY NEWS: उत्तर प्रदेश में प्रेस की स्वतंत्रता एक बार फिर सवालों के घेरे में है। प्राइवेट मुस्लिम डॉक्टर्स के संगठन इंटेलेक्चुअल सोशल वेलफेयर एसोसिएशन (ISWA) से जुड़े डॉक्टरों और अधिकारियों की सरकारी भूमिका उजागर होने के बाद संगठन के सचिव शकील अहमद का असली चेहरा सामने आ गया है। ये वही डॉ शकील अहमद हैं जिन्होंने एडी हेल्थ पर (इसवा) को लेकर सवाल उठाए थे उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत मुस्लिम डॉक्टरों और अधिकारियों के इस्वा संगठन से सक्रिय रूप से जुड़े होने की खबर प्रकाशित होते ही संगठन के सचिव शकील अहमद बुरी तरह बौखला गए और उन्होंने समाचार पत्र के संपादक को घेरकर अभद्र भाषा और गाली-गलौज की। आरोप नहीं, साक्ष्य मौजूद यह कोई आरोप मात्र नहीं है, बल्कि इस पूरी घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य, मौके पर मौजूद लोगों के बयान और घटनाक्रम की पुष्टि उपलब्ध है। घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई, जहां कई लोग मौजूद थे। संपादक को जानबूझकर रोका गया, दबाव बनाया गया और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया। यह साफ तौर पर पत्रकार को डराने-धमकाने और सच लिखने से रोकने की कोशिश थी। सरकारी पद + निजी संगठन = टकराव
सबसे गंभीर सवाल यह है कि— इस्वा संगठन में शामिल कई डॉक्टर और अधिकारी उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हैं
इसके बावजूद वे एक निजी संगठन के पदाधिकारी बने हुए हैं
इससे न केवल सरकारी सेवा नियमों पर सवाल उठते हैं, बल्कि संगठन की निष्पक्षता और मंशा भी संदेह के घेरे में आती है
इसी सच्चाई को सामने लाने का अपराध समाचार पत्र ने किया, जिसकी सजा संपादक को गाली-गलौज और दबंगई के रूप में देने की कोशिश की गई।
राजनीतिक संरक्षण में हुई दबंगई
घटना के समय शहर के दो डॉक्टर, जो कि राजनीतिक दलों से जुड़े नेता भी बताए जा रहे हैं और पूर्व में इस्वा के बड़े पदों पर रह चुके हैं, मौके पर मौजूद थे।
इतना ही नहीं, प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार:
समाजवादी पार्टी
और आज़ाद समाज पार्टी
से जुड़े कुछ स्थानीय नेता भी वहां उपस्थित थे।
पूरा घटनाक्रम राजनीतिक संरक्षण में घटित हुआ, जिससे साफ होता है कि यह कोई व्यक्तिगत गुस्सा नहीं, बल्कि संगठित दबाव की कार्रवाई थी।
सवाल जो पूरे शहर में गूंज रहे हैं
इस घटना के बाद बरेली से लेकर प्रदेश तक कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं—
क्या सच लिखने पर पत्रकारों को गालियाँ दी जाएंगी?
क्या राजनीतिक संरक्षण में प्रेस को कुचला जाएगा?
क्या सरकारी डॉक्टर निजी संगठनों के जरिए शक्ति प्रदर्शन कर सकते हैं?
क्या यह लोकतंत्र है या दबंगों का राज?
पत्रकार संगठनों में आक्रोश
घटना के बाद पत्रकार संगठनों और सामाजिक बुद्धिजीवियों में भारी रोष है।
स्पष्ट शब्दों में कहा जा रहा है कि
“अगर आज एक संपादक को घेरकर गाली दी जा सकती है, तो कल किसी भी पत्रकार को निशाना बनाया जा सकता है।”







