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न्याय की नयी परिभाषाःअदालत केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं.. न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह

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लेखक कुलदीप सिंह
प्रयागराज(प्रातःकाल एक्सप्रेस)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह का नाम आज न्यायिक अनुशासन, संवेदनशीलता और तकनीकी नवाचार से जुड़े फैसलों के लिए जाना जाता है। उन्होंने यह साबित किया है कि अदालत केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज में न्याय की भावना को सजीव रखने का माध्यम भी है।

 एक सुदृढ़ पृष्ठभूमि से न्याय की ओर
      21 जनवरी 1969 को उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में जन्मे संजय कुमार सिंह ने बचपन से ही शिक्षा और अनुशासन को अपने जीवन का आधार बनाया। मिर्जापुर में शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज, इलाहाबाद से इंटरमीडिएट तथा इविंग क्रिश्चियन कॉलेज, इलाहाबाद से बीएससी की पढ़ाई की।
माता-पिता के सुझाव पर उन्होंने कानून की ओर रुख किया और वर्ष 1993 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।
  उनके पिता स्वर्गीय श्री शीतला प्रसाद सिंह, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक प्रसिद्ध आपराधिक अधिवक्ता और राज्य के सरकारी वकील थे। पिता के मार्गदर्शन और न्याय के वातावरण में पले-बढ़े संजय कुमार सिंह ने कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि कानून का असली उद्देश्य केवल सजा नहीं, बल्कि समाज में संतुलन और विश्वास कायम करना है।
 वकालत से न्यायालय की कुर्सी तक का  सफर
    वर्ष 1993 में उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। उनकी सटीक तैयारी, तार्किक दृष्टिकोण और मुकदमों की गहराई में जाने की क्षमता ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई।
उन्होंने राज्य सड़क परिवहन निगम, उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड, डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय (आगरा) जैसे अनेक सरकारी संस्थानों का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा वे राजस्व खुफिया निदेशालय, सीमा शुल्क एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क, नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो, केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय के अधिवक्ता भी रहे।
  उनकी मेहनत और न्यायिक दृष्टि ने उन्हें 22 नवंबर 2018 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का न्यायमूर्ति बना दिया। यह उनके करियर का स्वाभाविक, किंतु गौरवशाली पड़ाव था।


न्यायिक योगदान जो बना उदाहरण
पोस्टमार्टम रिपोर्टों का डिजिटलीकरणः पारदर्शी न्याय की दिशा में कदम वर्ष 2022 के वसीम बनाम राज्य उत्तर प्रदेश मामले में न्यायमूर्ति सिंह ने आदेश दिया कि सभी पोस्टमार्टम और चोट रिपोर्टें टाइप की जाएं, ताकि वे पढ़ने योग्य हों। डीएनए और फिंगरप्रिंट नमूना अनिवार्य करने का निर्देश देकर उन्होंने जांच प्रक्रिया में तकनीकी पारदर्शिता की शुरुआत की।
आज यह पहल पूरे उत्तर प्रदेश में लागू है जिससे न केवल वकीलों को सुविधा मिली है, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी न्यायिक प्रक्रिया अधिक भरोसेमंद बनी है।


जनप्रतिनिधियों की आपराधिक पृष्ठभूमि पर स्पष्ट संदेश

   धनंजय सिंह बनाम राज्य उत्तर प्रदेश (2024) मामले में न्यायमूर्ति सिंह ने साफ कहा कि “जब लंबा आपराधिक इतिहास रखने वाला व्यक्ति कानून निर्माता बन जाता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा है।”
    यह बयान न केवल न्यायालय के आदेश के रूप में, बल्कि राजनीति और समाज दोनों के लिए चेतावनी के रूप में देखा गया।
यौन अपराध पीड़िताओं के बयान का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग आदेश
बुल्ले बनाम राज्य उत्तर प्रदेश (2021) में उन्होंने देखा कि 2009 में संशोधन होने के बावजूद पीड़िताओं के बयान ऑडियो-वीडियो माध्यम से दर्ज नहीं किए जा रहे थे। उन्होंने राज्य सरकार को तत्काल निर्देश दिया कृ और यह आदेश आज उत्तर प्रदेश की जांच प्रक्रिया में स्थायी सुधार बन चुका है।