22(1) और दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 303 तथा 41-डी के तहत अभियुक्त को अपनी पसंद के वकील से प्रतिनिधित्व कराने का मूलभूत अधिकार प्राप्त है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्मांतरण मामले में हद पार करने पर यूपी पुलिस को फटकारा पीठ ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो जमानत याचिका दाखिल करने के लिए वकालतनामे को अनिवार्य शर्त घोषित करता हो। हालांकि न्यायालय की प्रक्रिया के अनुसार किसी वकील को अधिकृत किए जाने का प्रमाण आवश्यक होता है। इस मामले में चूंकि वकील ज्योति राजपूत के पास अपीलकर्ता द्वारा निष्पादित तथा जेल प्रशासन द्वारा सत्यापित वकालतनामा मौजूद था, इसलिए न्यायालय ने NOC के अभाव को महत्वहीन मानते हुए मामले की मेरिट पर सुनवाई की।
अदालत ने यह भी गौर किया कि अपीलकर्ता, जो मृतका की सास हैं, को प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के अभाव में केवल अनुमान के आधार पर दोषी ठहराया गया था। साथ ही, सह-अभियुक्तों की अपीलें अभी सुनवाई के लिए तैयार नहीं हैं, जिससे मामला शीघ्र निपटने की संभावना नहीं है। यह देखते हुए कि अपीलकर्ता लगभग 13 वर्षों से जेल में निरुद्ध हैं खंडपीठ ने उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली और यह आदेश दिया कि अपील लंबित रहने तक ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया पूरा जुर्माना स्थगित रहेगा। मानवीय संवेदना के साथ न्यायालय ने निःस्वार्थ सेवा प्रदान करने वाली अधिवक्ता ज्योति राजपूत के प्रयासों की सराहना भी की। उन्हें एक प्रकार से न्याय मित्र के समान मानते हुए हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति को निर्देश दिया गया कि 15 दिनों के भीतर उन्हें 11,000 रुपये मानदेय के रूप में प्रदान किए जाएँ। मुख्य अपील की सुनवाई जनवरी 2026 में निर्धारित की गई है।







