जिलाधिकारी के आदेश बेअसर, खंड विकास अधिकारी की अनदेखी पर सवाल
SIDDHARTHNAGAR NEWS: गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने और ग्रामीणों को अपने कार्यों के लिए दूर न भटकना पड़े, इस उद्देश्य से सरकार ने हर ग्राम पंचायत में लाखों की लागत से पंचायत भवनों का निर्माण कराया। इन भवनों को ग्राम पंचायतों के लिए ‘मिनी सचिवालय’ के तौर पर विकसित किया गया, जहाँ ग्रामीणों को आसानी से सरकारी योजनाओं की जानकारी मिल सके और उनके छोटे-बड़े काम हो सकें। लेकिन, सिद्धार्थनगर जिले में शासन की यह महत्वपूर्ण मंशा धरातल पर दम तोड़ती दिख रही है। बढ़नी प्रखण्ड सहित जिले के चौदहों प्रखण्डों का यही हाल है, जहाँ 90 प्रतिशत ग्राम पंचायतों के पंचायत भवनों में ताले लटके रहते हैं! ये भवन आज केवल ढाँचा बनकर रह गए हैं। इन पंचायत भवनों को सक्रिय रखने और ग्रामीणों की मदद के लिए ‘पंचायत सहायकों’ की नियुक्ति की गई, जिन्हें सरकार नियमित मानदेय भी दे रही है। पंचायत सहायक का मुख्य कार्य ग्राम पंचायत के दस्तावेजीकरण, ऑनलाइन कार्यों और ग्रामीणों की सहायता करना है, ताकि उन्हें स्थानीय स्तर पर ही सुविधाएं मिल सकें। लेकिन, जमीनी सच्चाई हैरान करने वाली है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पंचायत सहायकों से उनका निर्धारित कार्य नहीं लिया जा रहा, बल्कि ज्यादातर कार्य रोजगार सेवकों से करवाए जा रहे हैं। रोजगार सेवक का मुख्य कार्य महात्मा गांधी नरेगा (मनरेगा) से संबंधित योजनाएँ और मजदूरों का लेखा-जोखा रखना है। ऐसे में प्रश्न यह है कि यदि पंचायत सहायक अपना कार्य नहीं कर रहे, तो उन्हें किस बात का मानदेय दिया जा रहा है और क्यों रोजगार सेवकों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिले के तेजस्वी जिलाधिकारी डॉक्टर राजा गणपति आर. ने कई बैठकों में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पंचायत भवन हर हाल में खुले रहने चाहिए और वे जनसेवा के केन्द्र बनें। लेकिन, जिलाधिकारी का यह आदेश केवल बैठक कक्षों तक ही सीमित होकर रह गया है। धरातल पर खण्ड विकास अधिकारी इस गम्भीर लापरवाही पर कोई ध्यान क्यों नहीं दे रहे? उनकी अनदेखी इस पूरे मामले को और भी सन्दिग्ध बना रही है।
पंचायत भवनों पर लटके ताले का सीधा असर ग्रामीणों पर पड़ रहा है। उन्हें आज भी छोटे-छोटे कार्यों जैसे जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, परिवार रजिस्टर नकल, आय-जाति प्रमाण पत्र, या सरकारी योजनाओं की जानकारी के लिए कई किलोमीटर दूर स्थित ब्लॉक मुख्यालयों का चक्कर काटना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों का अपव्यय होता है। यह स्थिति शासकीय धन के दुरुपयोग, प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़े प्रश्न, और ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा को कमजोर करती है। आशा है कि उच्चाधिकारी इस मामले को गम्भीरता से लेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि पंचायत भवन वास्तव में ग्रामीणों के लिए उपयोगी बनें, न कि केवल शासकीय कागजों में मौजूद एक आंकड़ा।







