Home उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायत सरकंडी काण्ड: पंचायतों पर गाज, नगर निकायों पर क्यों चुप्पी?

ग्राम पंचायत सरकंडी काण्ड: पंचायतों पर गाज, नगर निकायों पर क्यों चुप्पी?

पंचायती राज विभाग एवं ग्राम्य विकास विभाग के बाद नगरीय विकास विभाग पर भी उठने लगे सवाल

FATEHPUR NEWS: सरकंडी ग्राम पंचायत में हुई कार्रवाई ने जनपद की राजनीति और प्रशासनिक हलचल को तेज कर दिया है। प्रधान से लेकर रोजगार सेवक और पंचायत सचिव तक अब कार्यवाही की आंच से सहमे हुए हैं। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या केवल ग्राम पंचायतें ही भ्रष्टाचार का गढ़ हैं? क्या नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतें दूध की धुली हैं? जानकारों का मानना है कि नगर निकायों पर कार्रवाई न होने के पीछे राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक ढिलाई सबसे बड़ी वजह है। पंचायतों में आमतौर पर छोटे स्तर के लोग फंस जाते हैं, जबकि नगर निकायों में बैठे बड़े अधिकारी और अध्यक्ष अक्सर “बचाव का रास्ता” निकाल लेते हैं। फतेहपुर शहर, बिन्दकी नगर और कस्बों के लोगों की मांग है कि नगर निकायों की भी वैसे ही जांच हो जैसी पंचायतों की की जा रही है। क्योंकि लोगों का खुलेआम कहना है कि नगरीय निकायों में में सफाई व्यवस्था और नाली निर्माण पर अनगिनत सवाल हैं। वहीं कई नगर पंचायतों में विकास कार्य अधूरे और बजट कागजों में खत्म होते दिखते हैं। विभिन्न नगर पंचायतों में में भी सड़क और जल निकासी कार्यों पर अनियमितता की शिकायतें बार-बार उठती रही हैं। वैसे जनपद में सरकंडी काण्ड ने पंचायतों को हिला दिया है, लेकिन नगर निकायों पर चुप्पी अब और सवाल खड़े कर रही है। अगर प्रशासन वास्तव में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का इरादा रखता है, तो जांच का दायरा पंचायतों से आगे बढ़ाकर नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों तक ले जाना होगा। तभी जनता को यह भरोसा होगा कि “कार्रवाई सिर्फ छोटे लोगों पर नहीं, बल्कि बड़े पदों पर बैठे जिम्मेदारों पर भी होगी।”
पंचायतों पर शिकंजा, नगर निकाय पर खामोशी
ग्राम पंचायतों में गबन और अनियमितताओं को लेकर कार्रवाई तेज हुई है, और यह कदम स्वागत योग्य भी है। लेकिन जब नगर निकायों की तरफ नजर दौड़ाई जाती है तो वहां भी हालात किसी से छिपे नहीं हैं। करोड़ों रुपये का बजट आने के बावजूद शहर और कस्बों की तस्वीर बदहाल है। नालियां टूटी पड़ी हैं, सफाई व्यवस्था चरमराई है, सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं। सवाल उठता है कि यह पैसा आखिर कहां गया.
क्या नगर निकाय “अस्पृश्य” हैं?
सरकंडी जैसी पंचायत में लाखों का घोटाला हो तो कार्यवाही तुरंत हो जाती है, लेकिन नगर निकायों में करोड़ों की बंदरबांट पर चुप्पी क्यों? क्या वजह है कि नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतें प्रशासन की कार्रवाई से “अस्पृश्य” बनी हुई हैं? क्या यहां राजनीतिक दबाव इतना हावी है कि अधिकारी आंख मूंद कर बैठे हैं?
जनता के मन का सवाल
फतेहपुर, बिंदकी, खागा, धाता, हथगाम, असोथर, खखरेडू, जहानाबाद, बहुआ और किशनपुर सहित लगभग सभी नगर पंचायतों में हर जगह लोग पूछ रहे हैं कि नगर निकायों की जांच कब होगी। सफाई कर्मियों की फर्जी हाजिरी, अपूर्ण निर्माण कार्य, टेंडरों में हेराफेरी आदि ये सब काम खुले राज हैं लेकिन कार्रवाई नहीं होती। इससे यही संदेश जाता है कि प्रशासन छोटे स्तर पर तो सख्ती दिखाता है, लेकिन बड़े घोटालों पर चुप्पी साध लेता है। सरकंडी काण्ड ने पंचायतों को आईना दिखा दिया है। अब समय आ गया है कि यही आईना नगर निकायों के सामने भी रखा जाए। यदि प्रशासन वास्तव में भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए गंभीर है, तो उसे पंचायत और नगर निकाय दोनों को एक ही तराजू में तौलना होगा। क्योंकि जनता का सवाल सीधा है – “क्या नगर निकाय भ्रष्टाचार से मुक्त हैं, या फिर वहां की फाइलों पर सिर्फ सत्ता का ताला लगा है?”