MIRZAPUR NEWS: कर्बला की रेत पर खड़ा है हिंदुस्तान। हुसैन का पैग़ाम है हर दिल का अरमान। हर धर्म या हर मज़हब, सबका है ये मान। ईमाम हुसैन की ख़्वाहिश का नाम है हिंदुस्तान। कर्बला की रेत पर खून से लिखी गई कहानी आज भी हर दिल में ज़िंदा है। इमाम हुसैन (अ.स) ने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसाफ़, सच्चाई और इंसानियत की राह में गुज़ार दी। उनका मक़सद सिर्फ़ इस्लाम को बचाना नहीं था, बल्कि हर मज़लूम की आवाज़ बनना था। और यही वजह है कि उनका नाम सिर्फ़ अरब तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया की मिट्टी में भी घुल गया। ईमाम हुसैन (अ.स) का नाम हर धर्म, हर मजहब के लोगों के दिलों में बसा हुआ है। हिंदुस्तान ऐसा देश है जहां हर धर्म, हर जाति के लोग इमाम हुसैन अ.स से बेपनाह मोहब्बत करते हैं। हिंदुस्तान में एक ऐसी जाति के लोग हैं जिन्हें हिंदू “हुसैनी ब्राह्मण” कहा जाता है। भारत के ब्राह्मणों का एक बड़ा समुदाय खुद को “हुसैनी ब्राह्मण” कहता है। उनकी लोककथा कहती है कि उनके पुरख़े कर्बला की लड़ाई में हुसैन के साथ खड़े हुए थे। उनकी मशहूर कहावत है “वाह दत्त सुल्तान, हिंदू का धर्म, मुसलमान का ईमान, आधा हिंदू… आधा मुसलमान”। ईमाम हुसैन अ.स सिर्फ़ किसी एक मज़हब के नहीं, बल्कि हर कौम के हैं। महात्मा गांधी ने ईमाम हुसैन के बारे में कहा कि मैंने हुसैन से सीखा कि मज़लूम होकर भी कैसे जीत हासिल की जाती है। महात्मा गांधी जी ने कर्बला से अहिंसा और बलिदान की ताक़त सीखी और उसी से आज़ादी की लड़ाई में हक़ की आवाज़ बुलंद की।सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने ईमाम हुसैन के बारे में कहा कि “हुसैन जैसा कोई नहीं… उन्होंने हुसैन से सीखा कि मज़लूम होकर भी कैसे जीत हासिल की जाती है। उन्होंने इंसाफ़ के लिए अपनी जान दी, अपने बच्चों की कुर्बानी दी, लेकिन ज़ुल्म के सामने सर नहीं झुकाया। सिख गुरुओं ने ईमाम हुसैन को इंसाफ़ और सच्चाई का सबसे बड़ा प्रतीक माना। अल्लामा इक़बाल ने ईमाम हुसैन के बारे में लिखा कि “हुसैन ने अपने ख़ून से सच्चाई की नींव रखी, अगर हुसैन न होते तो इस्लाम न होता”। इक़बाल का मानना था कि हुसैन का नाम हर इंसानियत का नाम है, जो झुकना नहीं जानता। ईमाम हुसैन (अ.स) की ख़्वाहिश थी इंसाफ़ का परचम दुनिया की हर सरजमीं पर लहराया जाए। हिंदुस्तान की सरज़मीं ने इस मिशन को अपनाया। हिंदुस्तान के लोग कहते हैं: “हुसैन की ख़्वाहिश थी इंसाफ़, मोहब्बत और अमन… और हिंदुस्तान उसी ख़्वाहिश का नाम है।” कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन (अ.स) ने कहा कि “ज़ुल्म के सामने सर झुकाना मौत है, और हक़ के लिए मर जाना असली ज़िंदगी।” हिंदुस्तान के लोग यही सीख लेकर हर ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हैं। यही वजह है कि यहाँ की गलियों में, मोहल्लों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में, हर जगह नाम लिया जाता है: “लब्बैक या हुसैन… लब्बैक या हुसैन…”







