सालभर बहनों की सुध नहीं, रक्षाबंधन पर उपहार और कैमरों के बीच उमड़ा भाईचारा—कार्यक्रम में ही उठे दिखावे के सवाल
JHANSI NEWS: रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प की आड़ में यदि राजनीति की जमीन तैयार होने लगे तो सवाल उठना लाजिमी है। हंसारी क्षेत्र में एक राजनीतिक पार्टी से जुड़े नेता द्वारा स्थानीय गार्डन में आयोजित बड़े रक्षाबंधन कार्यक्रम को लेकर अब क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं को बुलाया गया, राखी बंधवाई गई, उपहार वितरित किए गए और बहनों की सुरक्षा व सम्मान की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प भी लिया गया। मंच से खूब वाहवाही बटोरी गई और तस्वीरें भी खिंचवाई गईं। लेकिन कार्यक्रम की चमक-दमक के बीच कुछ महिलाओं की कही बातों ने पूरे आयोजन के उद्देश्य पर ही सवालिया निशान लगा दिया। कार्यक्रम में शामिल कुछ महिलाओं ने कथित तौर पर दबे स्वर में बताया कि उन्हें फोन करके कार्यक्रम में आने के लिए कहा गया था और उपहार मिलने की बात भी बताई गई थी। महिलाओं के अनुसार, यदि यह आयोजन केवल भाई-बहन के आत्मीय रिश्ते और सम्मान के लिए था तो फिर उपहार के लिए बुलावे और कार्यक्रम में फोटो खिंचवाने की इतनी आवश्यकता क्यों पड़ी?
यहीं से सवाल उठता है कि क्या रक्षाबंधन का रिश्ता अब सियासी मंच, उपहार और कैमरे तक सीमित होकर रह गया है? कुछ महिलाओं ने आरोप लगाया कि जिन महिलाओं को नेता द्वारा बहन का दर्जा दिया गया, उनके विवाह के बाद सालभर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं रहा। न सुख-दुख में हालचाल, न पारिवारिक जरूरत में साथ और न ही सामान्य दिनों में भाई होने का अहसास—लेकिन रक्षाबंधन आते ही अचानक बहनों की याद ताजा हो गई। महिलाओं का कहना था कि रक्षाबंधन के दिन राखी बंधवाकर तस्वीरें खिंचवाने और समाज में अपनी छवि चमकाने की कवायद ज्यादा दिखाई दी, जबकि भाई का रिश्ता सिर्फ एक दिन का नहीं होता। कार्यक्रम में मौजूद एक महिला, जो स्वयं को नेता की बहन बताती हैं, ने कथित तौर पर दबे मन से कहा कि उनके भाई का उद्देश्य राजनीतिक पार्टी से चुनाव लड़ना और विधायक बनना है। इसलिए ऐसे कार्यक्रमों के जरिए जनता के बीच अपनी लोकप्रियता और सामाजिक छवि मजबूत करने की कोशिश की जा रही है. महिला की इस कथित टिप्पणी ने कार्यक्रम के पीछे छिपे राजनीतिक मकसद को लेकर चर्चाओं को और हवा दे दी। मंच से बहनों की सुरक्षा, सम्मान और जिम्मेदारी निभाने की कसमें खाना निश्चित रूप से सुनने में अच्छा लगता है। मगर असली परीक्षा मंच से उतरने के बाद शुरू होती है। बहनों का कहना है कि यदि भाई का रिश्ता वास्तव में दिल से है तो उसकी मौजूदगी केवल रक्षाबंधन के एक दिन नहीं, बल्कि जरूरत के हर समय दिखाई देनी चाहिए। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या रक्षाबंधन जैसे भावनात्मक पर्व को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाया जाना उचित है? क्या राखी बंधवाने और उपहार देने से ही बहनों के प्रति जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? या फिर बहन की सुरक्षा, सम्मान और सुख-दुख में साथ खड़ा होना ही वास्तविक भाईचारा है? कार्यक्रम को लेकर क्षेत्र में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि यदि किसी महिला को बहन माना जाता है तो उसके प्रति जिम्मेदारी केवल रक्षाबंधन के दिन क्यों याद आती है? राजनीतिक मंच पर राखी बंधवाने और तस्वीरें खिंचवाने से यदि सामाजिक छवि चमकती है, तो क्या यह पर्व रिश्ते का उत्सव रह जाता है या फिर सियासी प्रचार का जरिया बन जाता है? कार्यक्रम में उठी चर्चाओं ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि जनता अब केवल मंच की चमक नहीं, बल्कि नेता के व्यवहार का सालभर का हिसाब भी देखने लगी है।
रक्षाबंधन पर राखी की डोर तो कलाई पर बंध गई, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह डोर दिल से जुड़ी थी या फिर सियासत से?







