नेपाल में सम्मानित हुए रामबाबू तिवारी
PRAYAGRAJ NEWS: बुन्देलखण्ड की धरती पर सदियों से जीवन और संस्कृति के केंद्र रहे तालाब आज अंतरराष्ट्रीय विमर्श का विषय बन रहे हैं। जल संकट और जलवायु परिवर्तन के दौर में इन पारंपरिक जल संरचनाओं की उपयोगिता को रेखांकित करने वाले गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के शोधार्थी रामबाबू तिवारी को नेपाल के लुंबिनी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘अंतर्राष्ट्रीय अन्वेषक गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारतीय पारंपरिक जल ज्ञान और सामुदायिक जल प्रबंधन की वैश्विक स्वीकृति का भी प्रतीक है। लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय, लुंबिनी (नेपाल), लाल बहादुर शास्त्री स्मारक पी.जी. कॉलेज तथा कालिंदी प्रकाशन, भारत के संयुक्त तत्वावधान में 15 और 16 जून को आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में चार देशों के विद्वानों और शोधार्थियों ने भाग लिया। “शिक्षा, साहित्य, समाज और संस्कृति का वैश्विक विमशर्रू चुनौतियाँ, अवसर एवं संभावनाएँ” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में लगभग 140 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। रामबाबू तिवारी ने अपने शोध पत्र में बुन्देलखण्ड क्षेत्र के तालाबों की परंपरा, उनके सामाजिक-आर्थिक महत्व तथा पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों की वैज्ञानिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे कभी ग्रामीण जीवन की धुरी रहे तालाब आधुनिक विकास की दौड़ में उपेक्षा का शिकार हुए, जिसके परिणामस्वरूप जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट जैसी समस्याएँ सामने आईं। उनके अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि मृतप्राय तालाबों का पुनर्जीवन केवल जल संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण विकास का भी आधार बन सकता है। शोध में यह स्पष्ट किया गया कि तालाबों के संरक्षण से भूजल स्तर में सुधार, जैव विविधता का संरक्षण और स्थानीय समुदायों की जल संबंधी समस्याओं का समाधान संभव है। संगोष्ठी में आचार्य दयानिधि, परिसर प्रमुख, लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय, नेपाल ने रामबाबू तिवारी के कार्य की सराहना करते हुए कहा कि उनका शोध केवल अकादमिक अध्ययन नहीं है, बल्कि जनभागीदारी आधारित जल संरक्षण का एक प्रभावी मॉडल प्रस्तुत करता है। बुन्देलखण्ड जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्र में किए गए उनके अध्ययन और तालाब पुनर्जीवन संबंधी प्रयास समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और जल संकट की चुनौतियों से जूझ रही है, तब पारंपरिक जल संरचनाओं के संरक्षण और पुनर्जीवन की अवधारणा नई प्रासंगिकता प्राप्त कर रही है। विश्व स्तर पर भी तालाब आधारित जल प्रबंधन को टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल समाधान के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में रामबाबू तिवारी का शोध स्थानीय अनुभवों को वैश्विक विमर्श से जोड़ने का सफल प्रयास माना जा रहा है। सम्मान प्राप्त करने के बाद रामबाबू तिवारी ने अपने गुरुजनों, सहयोगियों और संस्थान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह उपलब्धि सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उनका शोध जल संरक्षण के क्षेत्र में नई सोच और जनजागरण को प्रेरित करेगा। बुन्देलखण्ड के तालाबों से शुरू हुई यह शोध यात्रा आज विश्व मंच तक पहुंच चुकी है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय समस्याओं पर किया गया गंभीर शोध न केवल समाज को दिशा दे सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पहचान और सम्मान अर्जित कर सकता है।







