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पुस्तकालय ज्ञान के दूतावास रहे हैं और पांडुलिपियां हमारी परंपरा की राजदूत:पद्मश्री डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी

DEHLI NEWS: दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय विज्ञान विभाग में दिल्ली विश्वविद्यालय पुस्तकालय विभाग छात्र संगठन ( क्न्स्ै।) की नव निर्वाचित कार्यकारिणी के सम्मान समारोह के साथ,ष् विकसित भारत में पुस्तकालय एवं पांडुलिपियों की भूमिकाष् विषय पर केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमांचल के कुलाधिपति  पद्मश्री डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी जी के व्याख्यान का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का आरंभ  पुस्तकालय विज्ञान छात्र संगठन के पदाधिकारियों के सम्मान से हुआ। इस कार्यक्रम में पद्म श्री डॉ हरमोहिंदर सिंह बेदी मुख्य अतिथि रहे । उन्होंने सभी नवनिर्वाचित छात्रों को शुभाशीष प्रदान किया। पुस्तकालय विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो आर.के भट्ट  ने भी सभी पदाधिकारियों का  सम्मान एवं स्वागत किया। प्रो. के.पी सिंह ने डॉ. बेदी सहित सभी का स्वागत एवं अभिनंदन किया।उन्होंने विभाग  के बारे में बताते हुए कहा कि भारत का पहला पुस्तकालय विज्ञान विभाग है जहां पर 1972 में कंप्यूटर एप्लीकेशन का पेपर सेमेस्टर सिस्टम और ट्यूटोरियल सिस्टम प्रारंभ करने वाला दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रथम विभाग है।उन्होंने बताया कि जब डिपार्टमेंट के इतिहास को खंगालते हैंय तो यह पूरे कॉमनवेल्थ देशों  का पहला डिपार्टमेंट है जहां पहला पदमश्री एस.आर.रंगनाथन जी को मिला। अमेरिका के बाद पुस्तकालय एवं सूचना के क्षेत्र में पीजी शुरू करने वाला प्रथम विभाग है। डॉ हरमोहिंदर सिंह बेदी ने  ,ष् विकसित भारत बनाने में पुस्तकालय एवं पांडुलिपियों की भूमिकाष् विषय पर सभी को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय ज्ञान के दूतावास रहे हैं और पांडुलिपियां हमारी  राजदूत। हमारे पुस्तकालय ज्ञान के घर थे। हम सभी जानते हैं कि पूरे विश्व में बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ तो उसमें नालंदा और तक्षशिला के पुस्तकालयों एवं पांडुलिपियों का सबसे बड़ा योगदान है। हर प्राचीन पुस्तकालय का विवरण यदि संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा है तो वह केवल हमारी संरक्षित पांडुलिपियों की वजह से ही पहुंचा है। उन्होंने कहा कि सरकार पांडुलिपियों के संरक्षण को लेकर के बहुत ही सजगता और संवेदनशीलता के साथ कार्य कर रही है। डॉ. बेदी ने कहा कि मोदी जी पांडुलिपियों के संरक्षण को लेकर स्वयं ही बहुत सक्रिय है और मोदी जी कहते हैं कि पांडुलिपियां देश के फेफड़े हैं । इन्हीं से देश की संस्कृति सांस लेती है। यदि हमें पुनः विश्व गुरु बनना है तो पांडुलिपियों का और पुस्तकालय का संरक्षण हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए। हमारा सारा अध्यात्म,दर्शन पांडुलिपियों के माध्यम से ही तो प्राप्त हुआ है। हमारे पुस्तकालयों ने पोथियों को सहज कर रखा जिसकी वजह से हमारी संस्कृति बची हुई है। यदि बात करें एशिया के इतिहासकारों, समाज शास्त्रियों एवं वैज्ञानिकों की तो उन्होंने भारत को देखने सुनने पढ़ने के लिए ऋग्वेद की ओर ही देखा। वहां से मानचित्रों, श्लोकों एवं विवेचन से भारत को जानने की कोशिश की। हम सब जानते हैं कि उवाच परंपरा या जिसको श्रुति एवं स्मृति परम्परा कहते है वह केवल भारत में है और इस परंपरा को लेखन तक पहुंचाने की क्षमता और कला केवल भारत में ही थी। एक एक श्लोक के विवेचन के लिए विद्वान एकत्र होते थे और मंथन करके उसको लिपिबद्ध करते थे। भारत में जब राजाओं के शासन भी रहे तब भी उनके अपने विशेष पुस्तकालय होते थे । जो विद्वानों का केंद्र हुआ करते थे। उन्होंने लाहौर के दंगों के समय में बाटा कंपनी के मालिक भल्ला जी द्वारा वहां के पुस्तकालयों से पुस्तकें ट्रकों में भर कर होशियारपुर पुस्तकालय पहुंचाने की मार्मिक घटना का भी उल्लेख किया। आज देश में सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक वातावरण तैयार हुआ है । उसका श्रेय इन पुस्तकालयों अर्थात ज्ञान घरों को जाता है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय विज्ञान विभाग के कायाकल्प के लिए प्रो. के.पी. सिंह जी की प्रशंसा की। क्न्स्ै। के नवनिर्वाचित अध्यक्ष देवांश सिंह ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का अद्वितीय संचालन विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. पिंकी जी ने किया। कार्यक्रम में प्रो. रवींद्र कुमार (डीन संस्कृति दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. मीरा,प्रो. एम. मधुसूदन,प्रो. परमजीत कौर वालिया,डॉ. मनीष कुमार डॉ. पी के जैन सहित  सैकड़ों की संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी उपस्थित रहे ।