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तीन मासूमों की मौत के बाद सवालों के घेरे में पंकज ईट उद्योग

जिले में ईंट भट्ठे के लाइसेंस से लेकर सुरक्षा मानकों की उठी जांच की मांग

निष्पक्ष जांच मे खुल सकती है कई विभागों की पोल

KUSHINAGAR NEWS: जनपद के कसया थाना क्षेत्र के ग्राम सभा मैनपुर के टोला दीनापट्टी स्थित पंकज ईंट उद्योग (आरएम मार्का ईंट) पर शनिवार को तीन मासूम बच्चों की हुई दर्दनाक मौत ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है। सबब यह है कि यह हादसा अब केवल डूबने की घटना भर नहीं रह गया है। हादसे के बाद पंकज ईंट उद्योग सहित जिले के अन्य ईट भट्ठों की कार्यप्रणाली, सुरक्षा इंतजाम, विभागीय अनुमति और कानूनी दस्तावेजों को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। लोगों का कहना है कि यदि भट्ठे पर सुरक्षा मानकों का पालन हुआ होता तो तीन मासूम असमय काल के गाल मे नही समाते। ‌बतादे कि  ईंट निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर मिट्टी की खुदाई की जाती है। नियमानुसार खुदाई के बाद बने गहरे गड्ढों की सुरक्षा, घेराबंदी और समतलीकरण जरूरी होता है, ताकि कोई हादसा न हो। लेकिन मैनपुर स्थित पंकज ईट उद्योग पर मिट्टी खनन के बाद बने गहरे गड्ढे खुले छोड़ दिए गए। नतीजतन बरसात का पानी भरने के बाद यह गड्ढा मौत का तालाब बन गया और उसी में तीन मासूम समा गए। अब सवाल यह है कि आखिर भट्ठा संचालक किन नियमों के तहत काम कर रहे थे? क्या मिट्टी खनन के लिए वैध अनुमति ली गई थी? क्या खनन विभाग ने खुदाई की सीमा और सुरक्षा मानकों की जांच की थी? क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी जारी है ? क्या श्रम विभाग में मजदूरों का पंजीकरण था? क्या वहां मजदूर परिवारों और बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था की गयी थी? इन सवालों ने प्रशासनिक सिस्टम को भी कटघरे में खडा कर दिया है। जानकार बताते हैं कि किसी भी ईंट भट्ठे के संचालन के लिए कई विभागीय की अनुमतियां आवश्यक होती हैं। इनमें प्रमुख रूप से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी, खनन विभाग की अनुमति, राजस्व विभाग से भूमि संबंधी स्वीकृति, श्रम विभाग में मजदूरो का पंजीकरण, जीएसटी एवं व्यवसायिक दस्तावेज, अग्निशमन विभाग की अनापत्ति और पर्यावरणीय मानकों का पालन मुख्य रुप शामिल होता है। साथ ही मजदूरों की सुरक्षा, बाल सुरक्षा, पानी भरे गड्ढों की बैरिकेडिंग और चेतावनी बोर्ड लगाना भी जरूरी होता है।लेकिन जिस स्थान पर यह हादसा हुआ, वहां न कोई सुरक्षा घेरा दिखा, न चेतावनी बोर्ड और न ही कोई ऐसा इंतजाम जिससे बच्चों को खतरनाक गड्ढे के पास जाने से रोका जा सके। यही वजह है कि ईट भट्ठों की निगरानी में प्रशासनिक लापरवाही और भट्ठा संचालको की मनबढई को देखते हुए लोगों में आक्रोश है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिले में तमाम ईंट भट्ठों पर नियम सिर्फ कागजों में चल रहे हैं, जमीन पर कुछ नहीं है
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जिन मजदूर परिवारों ने पेट पालने के लिए अपना घर-गांव छोड़कर कुशीनगर का रुख किया था, उन्हीं के मासूम बच्चे लापरवाही की भेंट चढ़ गए। घटना के बाद परिजनों की चीखें सुन हर किसी की आंखें नम हो गईं। मासूम बच्चों का शव जब पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया तो पूरा माहौल गमगीन हो उठा।
जिलाधिकारी ने भले ही पांच सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी हो और मृतकों के परिजनों को सहायता राशि देने की घोषणा की हो, लेकिन तीन मासूम बच्चों की मौत के बाद अब जांच केवल हादसे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि ईंट भट्ठे के संचालन से जुड़े हर पहलू की गहनता से जाच पड़ताल जरूरी  है। सूत्रो का दावा है कि बिना किसी प्रभाव मे आये प्रशासन द्वारा गंभीरता से निष्पक्ष जांच की जाती है तो निसंदेह कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जिलाधिकारी द्वारा गठित जांच टीम की जांच सिर्फ हादसे तक सीमित रहती है या फिर भट्ठे के लाइसेंस, खनन अनुमति, श्रम कानून, सुरक्षा मानकों के साथ साथ विभागीय मिलीभगत के गिरेहवान तक भी पहुंचती है? क्योंकि यह सार्वजनिक होना जरूरी है कि आखिर तीन मासूमों की मौत का जिम्मेदार सिर्फ पानी से भरा गड्ढा है, या फिर नियमों को ताक पर रखकर चल रही पूरी व्यवस्था?