प्रदीप जैन की बढ़ती लोकप्रियता से संगठन में बेचैन
JHANSI NEWWS: कांग्रेस में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। एक तरफ पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य लगातार जनता के मुद्दों को लेकर सड़कों पर संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ संगठन के भीतर बढ़ती बेचैनी और गुटबाजी अब खुलकर चर्चा का विषय बन चुकी है। कांग्रेस के अंदर चल रही यह खींचतान अब गलियारों से निकलकर कार्यकर्ताओं और आम जनता तक पहुंच चुकी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य पिछले कई दिनों से शहर और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर लगातार आक्रामक तेवर में नजर आ रहे हैं। कभी धरना-प्रदर्शन, कभी प्रशासनिक अधिकारियों का घेराव, तो कभी जनता के साथ सड़क पर उतरकर विरोध— उनकी सक्रियता ने एक बार फिर उन्हें कांग्रेस का सबसे सक्रिय चेहरा बना दिया है। जनता भी बड़ी संख्या में अपनी समस्याएं लेकर सीधे उनके पास पहुंच रही है, जिससे संगठन के भीतर कई नेताओं की बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर कांग्रेस संगठन के कुछ पदाधिकारियों को प्रदीप जैन आदित्य की बढ़ती लोकप्रियता क्यों चुभ रही है? चर्चा यह भी है कि जिला स्तर पर कई नेता इस बात से असहज हैं कि कार्यकर्ताओं और जनता का भरोसा लगातार पूर्व मंत्री की ओर बढ़ रहा है। यही वजह है कि संगठन के भीतर अंदरूनी खींचतान अब दबे स्वर से निकलकर खुली नाराजगी में बदलती दिखाई दे रही है। हालांकि सार्वजनिक मंचों पर प्रदीप जैन आदित्य लगातार संगठन की एकजुटता की बात करते हैं और सभी नेताओं को साथ लेकर चलने का संदेश देते हैं, लेकिन अंदरखाने की राजनीति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और प्रभाव को लेकर चल रही खींचतान अब किसी से छिपी नहीं रह गई है। वर्तमान दौर में जनता केवल बयानबाजी करने वाले नेताओं को नहीं, बल्कि जमीन पर संघर्ष करने वालों को पसंद कर रही है। यही कारण है कि जो नेता जनता के बीच लगातार मौजूद रहता है, उसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ती है। जनता अब पोस्टर और प्रेसवार्ता से ज्यादा सड़क पर संघर्ष करने वाले चेहरे को पहचान रही है।
वहीं दूसरी ओर केवल मीडिया में बने रहने या राजनीतिक प्रपंचों के जरिए चर्चा हासिल करने की कोशिश जनता के बीच ज्यादा असरदार साबित नहीं हो रही। कांग्रेस के भीतर कई वरिष्ठ कार्यकर्ता भी मौजूदा हालात को लेकर चिंता जता रहे हैं। उनका साफ कहना है कि यदि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा संगठनात्मक एकता पर भारी पड़ती रही तो आने वाले समय में पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
किसी भी राजनीतिक दल की ताकत उसके सामूहिक नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं की एकजुटता होती है। लेकिन जब नेता आपसी प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की लड़ाई में उलझ जाते हैं तो जनता के बीच गलत संदेश जाता है। जनता यह देख रही है कि उसकी समस्याओं के लिए सड़क पर कौन लड़ रहा है और कौन केवल राजनीतिक समीकरण साधने में व्यस्त है। फिलहाल झांसी कांग्रेस में मचा यह अंदरूनी घमासान आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रहा है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि पार्टी नेतृत्व बढ़ती नाराजगी और गुटबाजी पर लगाम लगा पाता है या फिर यह सियासी संघर्ष कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ा देगा।







