Home उत्तर प्रदेश इंकलाब के नारों से गूंजा आसमान, देर रात तक चला  कवि सम्मेलन

इंकलाब के नारों से गूंजा आसमान, देर रात तक चला  कवि सम्मेलन

SONBADHR NEWS: लता देवी वात्सल्य एवं जन सेवा सहयोग समिति के तत्वाधान में सोमवार को देर शाम को शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव के शहादत दिवस पर तियरा कलां, सोनभद्र में आयोजित कार्यक्रम ने पूरे क्षेत्र को क्रांतिकारी ऊर्जा से सराबोर कर दिया। 40वें वर्ष में आयोजित इस समारोह में देशभक्ति, सामाजिक चेतना और जनसंघर्ष की गूंज स्पष्ट सुनाई दी।
कार्यक्रम का शुभारंभ आयोजक अरुण पांडे के नेतृत्व में शहीदों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण के साथ हुआ। इंकलाब ज़िंदाबाद, और भारत माता की जय के गगनभेदी नारों से पूरा क्षेत्र देर तक गूंजता रहा। इसके पश्चात नर्वदेश्वर स्मृति पुरस्कार का वितरण किया गया, जहां उपस्थित जनसमूह ने स्वर्गीय नर्वदेश्वर देव पांडेय के योगदान और स्मृतियों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद शुरू हुआ वह  कवि सम्मेलन, जिसने रात को विचारों की क्रांति में बदल दिया। मंच पर आए कवियों ने अपनी ओजस्वी, मार्मिक और जनपक्षधर रचनाओं से न केवल मनोरंजन किया, बल्कि समाज और व्यवस्था पर तीखे सवाल भी खड़े किए। कवयित्री कौशल्या चौहान ने अपनी ओजपूर्ण पंक्तियों-तीर हूँ, तलवार हूँ, अंगार हूँ,भारत की मिट्टी से करती प्यार हूँ।से श्रोताओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित कर दी।जौनपुर से पधारीं सारिका श्रीवास्तव ने जीवन की विडंबनाओं को स्वर देते हुए कहा-सांस लेना दूभर, ज़िंदगी ज़हर लगती है,जिसने श्रोताओं को गहराई तक झकझोर दिया। डॉ. सीमा सिंह (मेडिकल ऑफिसर) ने राष्ट्र समर्पण की भावना को अभिव्यक्त करते हुए सुनाया-तन, मन, धन समर्पित वतन के लिए।कमलेश खांबे ने शहीदों के अदम्य साहस को याद करते हुए कहा-फांसी का फंदा चूमकर गाते थे वंदे मातरम।जिस पर पूरा पंडाल जोश से भर उठा। वीर रस के नवोदित कवि अर्पित शुक्ला ने मैं कलम की स्याही से तलवारों के वार लिखूंगा सुनाकर सभी रोंगटे खड़े कर दिए,,ओम प्रकाश त्रिपाठी ने व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए सुनाया-हर दिल में त्याग तपस्या हो,
तुम सब कुछ बेच दो लेकिन हिंदुस्तान मत बेचो।इन पंक्तियों ने श्रोताओं में जबरदस्त उत्साह भर दिया और तालियों की गूंज देर तक थमती नहीं दिखीदिलीप सिंह ने अपनी सशक्त प्रस्तुति से महफिल लूट ली और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।शायर विवेक चतुर्वेदी ने अपनी शायरी—दोस्ती है सबसे मगर यारी नहीं
से समकालीन रिश्तों की सच्चाई को बयां करते हुए श्रोताओं का दिल जीत लिया। कार्यक्रम का कुशल संचालन कर रहे अशोक तिवारी ने अपने ओजस्वी अंदाज में कहा—बूढ़ा शजर आंधियों की जद में आ गया सुनाया जिससे पूरा वातावरण वीर रस और क्रांतिकारी चेतना से भर उठा। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे शिवदास  ने मातृभूमि के प्रति समर्पण से भरी रचना प्रस्तुत कर कार्यक्रम को ऊंचाई प्रदान की।कवि सम्मेलन के संयोजक कवि प्रद्युम्न त्रिपाठी ने भोजपुरी के ओजपूर्ण स्वर में कहा-फांसी लागल भले गले में, झुके न दिहले निशान।जिसने श्रोताओं के रोंगटे खड़े कर दिए और पूरे माहौल को क्रांतिकारी जोश से भर दिया। कार्यक्रम के समापन पर आयोजक अरुण पांडे ने सभी अतिथियों, कवियों और उपस्थित जनसमूह के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि शहीदों के सपनों के भारत—सामाजिक न्याय, समानता और क्रांति—की दिशा में संकल्प का प्रतीक है।इस अवसर पर गुप्त काशी सेवा ट्रस्ट के मुखिया रवि चौबे, रालोद के जिला अध्यक्ष श्रीकांत त्रिपाठी, पूर्व ब्लॉक प्रमुख रमाकांत देव, सत्य प्रकाश सिंह, जगदीश शुक्ला, ओम प्रकाश, संतोष त्रिपाठी, शुभम त्रिपाठी, अनुज त्रिपाठी सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।