Home उत्तर प्रदेश आज के विद्यालय: टूटते हुए सपनों की दुनिया: डॉ अरशद सम्राट

आज के विद्यालय: टूटते हुए सपनों की दुनिया: डॉ अरशद सम्राट

SAHARANPUR NEWS: भारत के विद्यालय, जो कभी बच्चों के उज्जवल भविष्य को संवारने का मंदिर हुआ करते थे, आज जटिल और विकट समस्याओं के बीच संघर्ष कर रहे हैं। जहां शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और संस्कार देना होना चाहिए, वहीं इन विद्यालयों की हकीकत कहीं अधिक चिंताजनक है। हमारे स्कूल अब ऐसे वातावरण में फंसे हैं जहाँ अनुशासन टूट रहा है, हिंसा बढ़ रही है, और नियम-कानून कठोर होते जा रहे हैं।
विद्यालयों में अनुशासनहीनता और हिंसा
हिंसा विद्यालयों की कमजोर होती कमर का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहाँ छात्र अपने प्रिंसिपल या अध्यापकों के प्रति तीव्र आक्रामकता दिखाते हैं। प्रिंसिपल पर हमला करने तक की घटनाएँ शर्मनाक रूप से बढ़ रही हैं। फिर भी, नियमों के कारण ऐसे छात्रों को विद्यालय से निष्कासित करना, उनकी बोर्ड परीक्षा आयोजित करना या टीसी देना अवश्यंभावी माना जाता है।
विद्यालय जहाँ शिक्षक अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए भयभीत महसूस करते हैं, वहाँ उनकी सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्कूल परिसर में अनुशासनहीनता के कारण शैक्षिक वातावरण गुमराह हो रहा है।
छात्रों और अभिभावकों के बीच बढ़ती जटिलताएँ और दबाव
आज के छात्र अनेक मानसिक तनाव और जटिलताओं का सामना कर रहे हैं। सोशल मीडिया की दुनिया ने जलन, अविश्वास, और असहिष्णुता को जन्म दिया है। छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े, भेदभाव, और साइबर बुलिंग जैसे भयावह मनोवैज्ञानिक संकट विद्यालय के माहौल को विषैला बना रहे हैं।
वहीं अभिभावक भी विद्यालयों पर दबाव बनाने में पीछे नहीं हैं। वे फीस न देने, नियम तोड़ने और अपशब्दों से लैस होकर विद्यालय प्रबंधन और शिक्षकों पर हिंसात्मक व्यवहार करने से भी गुरेज नहीं करते। उनको जब भी लगे कि उनके बच्चे की किसी बात से असहमति हो, वे हिंसा, धमकी और अपमान की सीमा तक जाते हैं।
मनमानी है विद्यालय यूनिफार्म और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर
वर्तमान में विद्यालयों के सामने एक और बड़ी समस्या यूनिफार्म और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर उभरी है। कई छात्र और अभिभावक अपने धार्मिक और व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर अभिव्यक्ति की हदें पार कर रहे हैं। मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने पर विवाद के साथ-साथ जुम्मे की नमाज के दिनों पर जल्दी छुट्टी का दबाव भी कई विद्यालयों में बढ़ गया है। इसके अतिरिक्त, हिंदू बच्चे भी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों जैसे तिलक, कृपाण, कड़ा, गले में माला पहनना, बालों में अनत प्रकार के कटिंग डिज़ाइन जैसे विभिन्न स्वरूपों को लेकर विद्यालय प्रशासन के सामने हर समय चुनौती पेश करते हैं। अनेक बार अभिभावक इस मामले में भी विद्यालय के नियमों के विरुद्ध सहयोग करते हैं, जिससे विद्यालय प्रबंधन की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों की समस्या विद्यालयों में अनुशासन और एकजुटता को कमजोर कर रही है।
विद्यालयों का अस्तित्व दांव पर
फीस न जमा करने, नियमों की अवहेलना करने तथा अभिभावकों के निरंतर दबाव और हिंसात्मक व्यवहार के कारण कई विद्यालय संचालक हताश होकर अपने विद्यालय बंद करने पर मजबूर हो गए हैं। अनेक विद्यालय ‘फॉर सेल’ के बोर्ड लगा चुके हैं। शिक्षकों की सुरक्षा, सम्मान, और आजीविका भी संकट में है।
जहाँ बच्चों का भविष्य संवारने वाला विद्यालय अब अपनी प्रतिष्ठा बचाने में असमर्थ हो रहा है, वहाँ शिक्षा व्यवस्था की जमीन ही खोखली हो रही है।
नियम, कर्तव्य और सामाजिक यथार्थ के बीच संघर्ष
सरकार और शिक्षा बोर्ड बाल अधिकारों की रक्षा करते हुए कठोर नियम बनाए हैं, लेकिन ये नियम विद्यालयों की व्यावहारिक समस्याओं के साथ संघर्ष करते हुए उनकी कमर तोड़ रहे हैं। स्कूलों के पास अभिभावकों की मनमानी और छात्रों की समस्याओं का निपटारा करने के सीमित अधिकार हैं। नियमों में इस असंतुलन की कीमत विद्यालय और उनका शैक्षिक वातावरण चुका रहे हैं।
निष्कर्ष
भारत के विद्यालय जब अधिकारों की कठोरता, अभिभावकों की असहनीय मांगों, बच्चों के मनोवैज्ञानिक जटिलताओं और अनुशासनहीनता के बीच दब रहे हैं, तो हमारा शिक्षा का सपना केवल एक टूटते हुए महल जैसा प्रतीत होता है। आज के विद्यालयों को न केवल बच्चों के उज्जवल भविष्य की चाहिए बल्कि उन्हें चलाने वाले शिक्षकों और प्रबंधकों के संरक्षण की भी जरूरत है। तभी हम कह सकते हैं कि भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्वस्तरीय बनने की ओर बढ़ रही है।